कोरोना काल, कालाबाज़ारी और सोशल मीडिया

कोरोना वैश्विक महामारी अपने दूसरे चरण के साथ देश में तांडव कर रही है। देश और प्रदेश के सभी उपल्ब्ध संसाधन चारो पहर इस पर काबू करने में लगे हैं और रोक थाम के उपाय अपने निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं। संक्रमित मरीजों की संख्या में गिरावट दर्ज़ हो रही है। संक्रमण से ग्रसित, घरों में रहकर संयमित जीवनचर्या अपना कर ठीक हो रहे हैं। कुछ अस्पतालों में अनुभवी डॉक्टरों के देख रेख में तथा अस्पताल के पैरा मेडिकल लोगो के सहयोग से ठीक होकर घर वापस आ रहे हैं।

कुछ असामान्य स्थिति में ही परेशानी हो रही है जिसका निराकरण भी सभी मिलकर कर रहे हैं। ऑक्सीजन की पूर्ति हो, वेंटीलेटर की व्यवस्था, आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता या साधारण बेड की व्यवस्था हो,सभी में अनुकरणीय सुधार आया है और ऐसी कोई धारणा बनाने की अब आवश्यकता नहीं है कि इनकी कमी है, हां, प्रारम्भ में ऐसा फैलाया गया और कुछ परिवारों ने अनुभव भी किया पर इनके लिए भी हम स्वयं दोषी है क्योंकि हम में से कुछ ने इस परिस्थिति में भी कालाबाजारी और जमाखोरी में हाथ आजमाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

उनके लिए मानवता का कोई मूल्य नहीं केवल स्वार्थ और स्वार्थ। हर व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश रहती है और इस बार भी बहुत सुधार आया है धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा परन्तु दिल पर हाथ रखकर हमें सोचना होगा कि इस विकराल समस्या के लिए हम तो दोषी नहीं है? सभी संबंधित विभागों, सरकार द्वारा बार बार और हर मौके पर इस से बचने के लिए गाइड लाइंस बताए गए पर क्या हमने उनकी धज्जियां नही उड़ाई? अभी भी समय अपने हाथ में ही है प्रसारित एवं प्रचारित गाइड लाइंस का अक्षरसह: पालन ही एक मात्र बचाव का रामबाण हैं।

हम तो इतने भाग्य के धनी है की अब एक नहीं, दो नहीं, तीन तीन वैक्सीन उपलब्ध हैं और अठारह वर्ष से उपर सभी को लगना प्रारंभ भी हो गया है। विदेशों की स्थिति का अध्ययन करें तो पता चलेगा की एक देश में तो विदेश मंत्री को वैक्सीन उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कर पाने के कारण त्याग पत्र देना पड़ा। वैक्सीन आवश्यक रूप से लगवाना चाहिए, बचाव का एक माध्यम है। यहां कहना चाहूंगा की दिखावे का परोपकार नही करें।

बहुत से ऐसे उदाहरण ध्यान में आता है की केवल फोटो खिंचवाने के लिए, स्वयं प्रसिद्धि के लिए कुछ लोग परोपकार का दिखावा करते है, हमें इस से बचना चाहिए। जरा उस परिवार या व्यक्ति की मनोदशा को समझें जिसने जीवन भर मुठ्ठी बंद कर के परिवार की इज्जत बचा कर रखी, किन्ही कारणों से आज उस पर विपदा आ पड़ी, वो किसी से कुछ कह भी नही सकता, अंदर ही अंदर घुटता है, हाथ फैला नही सकता किसी के आगे और उसे भय है की कोई परोपकारी एक बार आएगा और कुछ देते हुए अपनी प्रसिद्धि के लिए फोटो लेगा जिसे सब जगह प्रचारित करेगा प्रसारित करेगा। कितनी आत्मग्लानि महसूस होगी उस परोपकार के बदले लेने वाले को। इसका एहसास करना बहुत आवश्यक है और अपने को दूर रखें ऐसे संस्थाओं से, समाज से, व्यक्तियों से जिन्हे अपने प्रसिद्धि के आगे दूसरे की व्यथा नही दिखलाई देती।

आज कल सोशल मीडिया ऐसे फोटो और समाचारों से भरे पड़े हैं।अगर हम विदेशों का कई बातों में उदाहरण देते है तो उस का भी मनन करना चाहिए जहां किसने किसको क्या दिया कब दिया और कहां दिया इसका पता ही नही चलता। समय अनुकूल हो रहा है अपना एवं अपने परिवार का तथा आस पास का पूरा ध्यान रखें और बिना दिखावा किए जो संभव सहायता कर सकते हैं जरूर करें तथा सरकार द्वारा दिए गए गाइडलाइंस का पूर्ण रूप से पालन करें तथा औरों को भी पालन करने के लिए उत्प्रेरित करें।

अरूण कुमार सिन्हा

गाजियाबाद

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