किसान आंदोलन: क्या भारत में पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है?

जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है तब से देश में कई गुट बन गए हैं, और यह सिर्फ राजनीति में नहीं बल्कि पत्रकारिता में भी साफ तौर से देखने को मिल रहा है।

By Nishu Malik

पिछले कुछ दिनो से जैसा भारतदेश में चल रहा है उस पर कईं सवाल उठ रहे है। जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है तब से देश में कई गुट बन गए हैं, और यह सिर्फ राजनीति में नहीं बल्कि पत्रकारिता में भी साफ तौर से देखने को मिल रहा है।जहां एक तरफ देश को लोकतंत्र कहा जाता है तो वहीं दूसरी ओर सच बोलने वालों के खिलाफ कुछ अलग ही साजिशें की जा रही है। दरअसल 26 जनवरी के दिन दिल्ली में हुई हिंसा के बाद से माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। दुनिया में कई लोगों का ऐसा मानना है कि भारत का लोकतंत्र कमजोर होता जा रहा है और यही वजह है कि लगातार प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल भी उठ रहे हैं और हमले भी हो रहे हैं।

यह भी पढ़ें – क्या इस मुद्दे से LG और “आप” सरकार के बीच हो सकता है एक नए झगड़े का आगाज़ ?

2020 में वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में फिसला भारत

बता दें कि बीते साल 2020 में 180 देशों के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत ने दो पायदान को दिए हैं जो काफी अटपटी सी बात है। अगर हाल ही में चल रहे किसान आंदोलन की कवरेज को देखा जाए तो कुछ पत्रकारिता के लोग सरकारी हो गए हैं तो कुछ विपक्षी में आ गए। जिस तरह से दिल्ली में हुई हिंसा के बाद से पत्रकारों पर राष्ट्र और राष्ट्रीयता के खिलाफ शत्रुता पूर्व बयान देने के लिए जाम लगे हैं तो वही महिला पत्रकारों को भी खुले तौर पर धमकियां दी जा रही है।उसकी शुरुआत हुई थी दिल्ली हिंसा के बाद जब एक प्रदर्शनकारी की मौत पर कई सवाल उठे थे। प्रदर्शनकारी की मौत पर दिल्ली पुलिस का कहना था कि ट्रैक्टर पलटने से उसकी मौत हुई है तो वहीं परिवार ने दिल्ली पुलिस पर गोली मारे जाने के आरोप लगाए थे। जब परिवार ने इस तरह के आरोप लगाए तो कुछ पक्षों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया था ,और यही वजह बन गई कि पत्रकारों के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने लगे। अगर देखा जाए तो देश का माहौल कुछ ऐसा है कि कोई भी प्रेस संस्था सरकार से सवाल करने में हिचकिचाने लगी है।अगर मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली की माने तो भारतीय अधिकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने और सरकार के आलोचकों को परेशान करने और घटनाओं की रिपोर्टिंग करने वालों पर मुकदमा दायर करने की नीतियां चल रही है।तो वही एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कहा है कि पुलिस केस मीडिया को डराने परेशान करने और धमकाने का एक प्रयास है।

यह भी पढ़ें – मीडिया और जनआंदोलन विषय पर वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय से रंजना बिष्ट की बातचीत

जब 405 भारतीयों पर हुए देशद्रोही के मुकदमें दर्ज

कई इस बात पर सवाल उठाते हैं कि औपनिवेशिक काल के राजद्रोह क़ानून का इस्तेमाल असहमति पर नकेल कसने के लिए क्यों किया जा रहा है. वेबसाइट आर्टिकल-14 की ओर से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक़, बीते एक दशक में नेताओं और सरकारों की आलोचना करने वाले 405 भारतीयों के ख़िलाफ़ राजद्रोह के ज़्यादातर मामले 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद दर्ज किए गए.तो वहीं अगर पिछले साल की वारदातों पर नजर डाली जाए तो कारवां के चार पत्रकारों पर दो बार उस वक्त हमला हुआ था जो सांप्रदायिक दंगों के बाद के हालातों पर और दिल्ली में एक किशोरी के कथित बलात्कार और हत्या के मामले में प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे थे।दरअसल कारवां के इन पत्रकारों पर इसलिए हमला हुआ है क्योंकि यह खोजी समाचार पत्रिका है और अक्सर अपनी रिपोर्टों के जरिए मोदी सरकार से सवालात करती रहती है।वैसे आपको बता दें कि दिल्ली हिंसा के बाद से कई पत्रकारों के ट्विटर अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया है तो वहीं कुछ महिला पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी गई है। दिल्ली की फ़्लैश पत्रकार नेहा दिक्षित कहती है कि उनका पीछा किया गया और इतना ही नहीं उनको खुलेआम बलात्कार और हत्या तक की धमकी दी गई है और साथियों को बुरी तरीके से ट्रोल करते हुए लोगों ने उसके अपार्टमेंट में घुसने की कोशिश भी की है।तो वहीं दूसरी पत्रकार रोहिणी सिंह को भी कथित रूप से जान से मारने और बलात्कार की धमकी देने के आरोप में 1 लोग के छात्र को गिरफ्तार किया गया है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की वारदातें होना अपने आप में कई सवाल पैदा करता है । अब इस पर क्या कहा जाए जब देश के चौथा स्तंभ ही खतरे में हो जाए तो दुनियाभर के लोग सवाल करें यह तो लाजमी है। क्या कहा जाए इस पर जब इन पत्रकारों को खामोश करने के लिए जेलों में बंद कर दिया जाए। और अगर इन बातों पर गौर किया जाए तो यह 2014 में पीएम मोदी की सत्ता के बाद सबसे ज्यादा हुआ है जब खुलेआम ,खुलेतौर पर पत्रकारों को धमकी दी जा रही है।

यह भी पढ़ें – क्या इस मुद्दे से LG और “आप” सरकार के बीच हो सकता है एक नए झगड़े का आगाज़ ?

Leave a Reply