परिकथा पत्रिका मई-जून अंक: रिव्यू

परिकथा पत्रिका का मई-जून अंक परसों दोपहर ऑनलाइन मिला. मुद्रित अंक आने में समय लगेगा. आदरणीय शंकर सर से २४ अप्रैल के बाद एक बार बात हुई तब पता चला अंक प्रेस में जाने को है. ऐसे समय में जब महामारी और लॉकडाउन से स्थितियाँ चरमराई हुई हैं शंकर सर ने अंक की निर्धारित सामग्री से कुछ ज़रूरी लेख आदि निकालकर जिस तरह संभव हुआ इसी अंक में कथाकार-आलोचक रमेश उपाध्याय पर जबरीमल पारख जी और महेश दर्पण जी का संस्मरण और उनकी कथा यात्रा और जीवन यात्रा को आधार बनाकर नंद भारद्वाज जी का लेख प्रकाशित किया. परिकथा से रमेश जी का लंबा जुड़ाव रहा था.

कहानियाँ,आलोचना, फ़ेसबुक डायरी के साथ यथार्थवाद पर उनकी वैचारिक शृंखला को भी परिकथा ने प्रकाशित किया था. अपनी ओर से श्रद्धांजलि देते हुए शंकर सर ने लिखा है —“ साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी अनुपस्थिति निस्संदेह एक ख़ालीपन पैदा करेगी जिसे आने वाले वर्षों में महसूस किया जाएगा।”

इस अंक में रमेश जी की फ़ेसबुक डायरी के हिस्से भी प्रकाशित हैं. पारख सर ने व्यक्ति .कथाकार और चिंतक रमेश उपाध्याय के कई पक्ष सामने रखे हैं. उनको पढ़ते हुए बहुत से पल याद आते रहे जिनकी मैं साक्षी रही. इस पूरी पीढ़ी ने जिस सामाजिकता के साथ साहित्य की आत्मीय और संघर्षशील यात्रा की वह आने वाले समय के लिए अनमोल होगी.

नंद अंकल का लेख वैचारिकता से युक्त संस्मरण लेख हैं पर रमेश जी की कहानियों का विश्लेषण उसमें बहुत गहराई से किया गया है . अभी कुछ दिन पहले उनकी कहानियों पर नंद अंकल ने सुभाष नीरव जी के कार्यक्रम लेखक कोना में बात रखी थी और कहानी पाठ किया था उसकी स्मृति तो एकदम ताज़ा है .एक झरने की मौत कहानी का पाठ अभी तक अपने पूरे प्रभाव के साथ बना हुआ है. लेख के आरंभ में शमसुल इस्लाम जी के लेख के अंश दिए गए हैं जिसमें रमेश जी की मृत्यु के सच शामिल हैं.

आज भी वह समय पूरी पीड़ा और विवशता के साथ दिमाग़ पर चोट करता है. महेश दर्पण जी ने रमेश जी के एक कथाकार-संपादक का जीवंत शब्दचित्र रचा है. जो आत्मीय भी है और व्यापक समाज के प्रति चिंतित रचनाकार का ठोस नज़रिया भी सामने लाता है. एक संपादक की कर्मठ छवि,एक पिता की समर्पित छवि के साथ विचार की ऊर्जा से भरे दोस्ती की लौ से जगमगाते रमेश उपाध्याय को उनकी रचनाशीलता के संदर्भ में याद किया जाना ज़रूरी है.

परिकथा और शंकर सर का आभार कि इस विकट समय में उन्होंने तैयार अंक को फिर से नए लेखों को देकर रमेश जी को याद किया है, और महेश जी, पारख सर और नंद अंकल को भी आभार.

प्रज्ञा रोहिणी

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