बिहार की राजनीति में जाति कितनी अहम?

By Pradeep Shah

कभी सवर्णों के वर्चस्व वाली बिहार की राजनीति में अब पिछड़ों का दबदबा है. चाहे सरकार कोई भी बनाए, अहम भूमिका पिछड़ा वर्ग निभाता है.

एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइज़ेशन) के अनुमान के मुताबिक़, बिहार की आधी जनसंख्या ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) है. राज्य में दलित और मुसलमान भी बड़े समुदाय हैं.

लेकिन इन सब वर्गों के अंदर कई वर्ग बने और बनाए भी गए जो अलग-अलग तरह से वोट करते हैं. पार्टियों के लिए इन वर्गों के वोट बांधना आसान नहीं होता.

बिहार में बिना जाति की बात किए न तो प्रोफ़ेशनल राजनीति पर बात हो सकती है और न ही सामाजिक राजनीति पर. कहने का मतलब ये है कि अगर किसी विभाग में कोई नियुक्ति भी होती है तो भी जाति का ध्यान रखा जाता है.

2015 बनाम 2020 विधानसभा चुनाव

साल 2015 में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने मिलकर चुनाव लड़ा था. साथ में कांग्रेस पार्टी भी थी.

राजद के पारंपरिक वोटर यादव और जेडीयू के ‘लव-कुश’ यानी कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा एक जगह आए. बाकी पिछड़े वर्ग के वोट नहीं बंटे. मुसलमान वोटर भी एक तरफ़ रहा.

राजद को सबसे ज़्यादा 80 सीटें मिलीं. जदयू को 71 और कांग्रेस को 27.

इस गठबंधन को तक़रीबन 42 फ़ीसदी वोट मिले. वहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 53 सीटों पर रही और वोट प्रतिशत 24.4% रहा. एनडीए का वोट प्रतिशत कुल मिलाकर 29-30 फ़ीसदी के आस-पास रहा.

बिहार में 15 फ़ीसदी यादव हैं लेकिन फिर भी पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 61 यादव उम्मीदवार जीते थे.

बिहार में कोइरी जाति के 8 फ़ीसदी लोग हैं लेकिन 19 विधायक बने. कुर्मी हैं 4 फ़ीसदी लेकिन 16 विधायक बने.

वहीं, बिहार में 16 फ़ीसदी मुसलमान हैं और उन्होंने 24 सीटें जीतीं. मुसहर बिहार में पाँच फ़ीसदी हैं लेकिन एक ही सीट जीत पाए.

जातीय समीकरणों के हिसाब से किसका पलड़ा भारी?

बिहार में इस वक़्त राजनीति त्रिकोणीय है जिसमें बीजेपी, जेडीयू और राजद मुख्य भूमिका में हैं. जब-जब इनमें से दो पार्टियों ने हाथ मिलाया है, वे सत्ता में आई हैं.

इस हिसाब से उन्हें इस वक़्त एनडीए का पलड़ा भारी लगता है.

सीएसडीएस के संजय कुमार कहते हैं कि अभी बहुत स्पष्ट रूप से जाति समीकरण एनडीए की तरफ़ है.

राजद अभी भी मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के साथ गठबंधन की कोशिशों में लगी है ताकि मल्लाह और कुशवाहा वोट अपने पाले में कर सके.

कांग्रेस पार्टी के पास अब बिहार में सवर्ण भी नहीं रहा. जहां राजद को लगता है कि उनकी पार्टी का उम्मीदवार जीतने की स्थिति में नहीं है, वहां वे कांग्रेस को सीट दे देते हैं.

सभी जातियों का कुछ ना कुछ वोट उन्हें ज़रूर मिलता है. हालांकि वोट प्रतिशत बहुत कम हो गया है. फ़ायदा बस ये होता है कि राजद और कांग्रेस जब एक हो जाते हैं तो मुसलमानों का वोट एक जगह हो जाता है. कांग्रेस की वजह से कुछ सवर्णों का वोट भी आरजेडी की तरफ़ आने की गुंजाइश रहती है. अलग-अलग जातियों का छिटका हुआ वोट कांग्रेस के पास जमा हो जाता है.

Leave a Reply