म्‍यांमार में सेना के तख्‍तापलट से भारत की व्यापारिक स्थिति कहां पहुंची ?

म्‍यांमार में सेना ने सोमवार को किया था तख्‍तापलट

By Vishal Joshi

म्‍यांमार में सेना ने सोमवार को एक बार फिर से तख्‍तापलट कर दिया और देश की नेता आंग सांग सू की को हिरासत में ले लिया। म्‍यांमार की सेना जब देश में तख्‍तापलट कर रही थी, उस समय का एक लाइव वीडियो अब सोशल मीडिया पर रेकॉर्डतोड़ देखा जा रहा है। इस लाइव वीडियो में एक महिला म्‍यांमार की संसद के सामने एरोबिक्‍स क्‍लास कर रही है और पीछे सेना के वाहन संसद पर कब्‍जा करने के लिए बढ़ रहे हैं।

महिला म्‍यांमार की संसद के सामने एरोबिक्‍स क्‍लास कर रही है और पीछे सेना के वाहन संसद पर कब्‍जा करने के लिए बढ़ रहे हैं।

ट्विटर पर शेयर हुए इस वीडियो को अब तक 80 लाख से ज्‍यादा बार देखा जा चुका है। इस वीडियो को 36 हजार बार रिट्वीट किया जा चुका है और लाखों लोगों ने इसे लाइक किया है। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि महिला तेज म्‍यूजिक के बीच में एरोबिक्‍स क्‍लास करती रही और सेना ने संसद भवन पर कब्‍जा कर लिया। महिला को पता भी नहीं चल पाया कि देश में तख्‍तापलट हो गया है। इस महिला का नाम खिंग हनिन वेई बताया जा रहा है। वह शारीरिक शिक्षा की टीचर बताई जा रही है

सेना ने देश की सर्वोच्च नेता और स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। आजादी मिलने के बाद से म्यांमार पर ज्यादातर वक्त सेना का शासन रहा है। वर्ष 1962 में सेना यहां सत्ता पर काबिज हो गई थी। सेना की तानाशाही से देशवासियों को आजादी दिलाने और लोकतंत्र की बहाली के लिए आंग सान सू की 22 साल लंबी लड़ाई लड़ी थी। आइए जानते हैं कि म्यांमार में क्यों पैदा हुआ राजनीतिक संकट, कौन हैं आंग सान सू की और सेना प्रमुख जनरल मिन आंग ह्लाइंग, भारत पर क्या होगा इसका असर…

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सोमवार सुबह पार्टी को अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करना था. लेकिन हुआ कुछ. संसद के पहले सत्र से कुछ घंटे पहले सू ची समेत कई राजनेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में परदे के पीछे से सेना ने म्यांमार पर कड़ी पकड़ बना रखी थी. इसमें सबसे बड़ा योगदान म्यांमार के संविधान का है जिसमें संसद की सभी सीटों का एक चौथाई हिस्सा सेना के हाथों में रहता है और देश के सबसे शक्तिशाली मंत्रालयों का नियंत्रित करने की गारंटी सेना को देता है.

ऐसे में सवाल यही उठता है कि आखिर ये हुआ क्यों? और अब आगे क्या होने वाला है?

बीते साल नवंबर में होने वाले चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी एनएलडी को 80 फ़ीसदी वोट मिले. ये वोट आंग सान सू ची की सरकार पर रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार के लगने वाले आरोपों के बावजूद मिले.

इन नतीज़ों के बाद सेना के समर्थन प्राप्त विपक्षी पार्टी ने चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाया. इस आरोप को एक बयान की शक्ल देते हुए नए कार्यकारी राष्ट्रपति मीएन स्वे ने हस्ताक्षर के साथ बयान जारी किया और इसके साथ ही देश में साल भर लंबा आपातकाल लागू हो गया.

म्यांमार के कार्यकारी राष्ट्रपति मीएन स्वे ने अपने बयान में कहा, “चुनाव आयोग 8 नवंबर को हुए आम चुनाव में वोटर लिस्ट की बड़ी गड़बड़ियों को ठीक करने में असफ़ल रहा है.”

लेकिन इस आरोप को साबित करने के लिए उनके पास पुख़्ता सबूत नहीं थे.

ह्यूमन राइट वॉच, एशिया के डिप्टी डायरेक्टर फ़िल रॉबर्टसन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “ज़ाहिर तौर पर आंग सान सू ची को चुनाव में बड़ी जीत मिली. लेकिन नतीजे आने के बाद चुनावों में धांधली के आरोप लगाए गए. ये सब कुछ ट्रंप के दावों जैसा लग रहा था जहां आरोपों को साबित करने के कोई सबूत नहीं थे.”

नवंबर में हुए चुनावों में सेना के समर्थन वाली यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवेलपमेंट पार्टी (यूएसपीडी) भले ही चुनाव जीतने से पीछे रह गई हो लेकिन इससे सेना का जो संसद में दख़ल है वो कम नहीं होने वाला था. साल 2008 में एक संवैधानिक संशोधन किया गया जिसके तहत सेना के पास 25 फ़ीसदी सीटों का आधिकार होता है. साथ ही तीन अहम मंत्रालय- गृह, रक्षा और सीमाओं से जुड़े मामलों के मंत्रालय का अधिकार पूरी तरह से सेना के पास होता है.

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2008 के संविधान के तहत सुरक्षा से जुड़े सभी मंत्रालयों पर सेना का नियंत्रण है। मौजूदा संविधान के तहत संसद की एक चौथाई सीटें भी सेना के लिए आरक्षित है। ऐसे में म्‍यांमार सरकार द्वारा कोई संशोधन सेना के पक्ष में नहीं है। इतना ही नहीं सेना को संविधान में किसी बदलाव पर वीटो लगाने का अधिकार है। उनका कहना है कि म्‍यांमार में निर्वाचित सरकार के पीछे हुकूमत सेना का ही चलता है।

यहां लोकतांत्रिक सरकार के हाथ बंधे हैं। यही कारण है कि आंग सांग की पार्टी ने विवादित दस्‍तावेज में बदलाव का वादा किया था। इसी क्रम में एक समिति बनाने के प्रस्‍ताव पर संसद में मदतान कराया गया था, जो भारी बहुमत से पारित हो गया था। इसके बाद सेना को यह भय सताने लगा कि सत्‍ता से उनका नियंत्रण खत्‍म हो जाएगा। ऐसे में सेना ने आंग सांग की इस कवायद को समाप्‍त करने के लिए यह कदम उठाया।

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