स्मृति-विस्मृति, काल और कालातीत के रेशों से बुना जादुई यथार्थ- ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ उपन्यास

By shubhneet kaushik

इस वर्ष उपन्यासकार गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के कालजयी उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ के अंग्रेज़ी संस्करण के प्रकाशित होने के पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। मूल रूप से स्पैनिश में 1967 में प्रकाशित इस उपन्यास का ग्रेगरी रबासा द्वारा किया गया अंग्रेज़ी तर्जुमा 1970 में छपा था। अभी हाल ही में मैंने मार्केज़ के इस अद्भुत उपन्यास को पढ़ा। एक गाँव मेकोंडो और उसे बसाने वाले बुएंदिया परिवार के सदस्यों के जीवन की घटनाओं के जरिए गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ लातिन अमेरिका ही नहीं अफ्रीका, एशिया के तमाम देशों के उपनिवेश बनने,साम्राज्यवाद के प्रसार, साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षों और मुक्ति-संग्रामों, पूंजीवादी शक्तियों की बर्बरता की इतिहास-गाथा हमारे सामने रख देते हैं।

इस उपन्यास में वर्णित मेकोंडो गाँव में केले की कंपनी की स्थापना, धीरे-धीरे उस कंपनी द्वारा मेकोंडो की ज़मीन पर काबिज होने, रेलवे का इस्तेमाल करते हुए मेकोंडो के संसाधनों का भरपूर दोहन, वहाँ दुनिया के दूसरे हिस्सों से लाकर लोगों को बसाने और अंततः श्रमिकों द्वारा हड़ताल किए जाने पर सेना द्वारा उन पर गोलीबारी और नरसंहार – यह एक ऐसी कहानी है जो दुनिया भर में साम्राज्यवादी और नवसाम्राज्यवादी ताक़तों ने बार-बार दुहराया है।

मार्केज़ राज्य और पूंजीवाद के गठजोड़, राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल किए जाते लोगों की त्रासदी बख़ूबी कहते हैं। केले की कंपनी के विरुद्ध संगठित होते श्रमिकों द्वारा अधिकारों की मांग करते हुए हड़ताल पर जाने, सेना द्वारा मार्शल लॉ लगाए जाने और हड़ताल कर रहे श्रमिकों पर बगैर चेतावनी के अचानक गोलीबारी का विवरण रोंगटे खड़े कर देता है।

उपन्यास का एक प्रमुख पात्र जोस आर्केडियो सेगुंदो गोलीबारी के दौरान मौजूद रहता है और जीवित बच जाता है। जब उसे होश आता है तो वह अपने को मृत शरीरों से भरी दो सौ बोगियों वाली ट्रेन की एक बोगी में पाता है जो समुद्र की ओर जा रही होती है। ताकि गोलीबारी में मारे गए लोगों को बेकार हो गए केलों की तरह समुद्र में बहाया जा सके। जोस आर्केडियो उस ट्रेन से कूदकर अपनी जान बचाता है।

लेकिन इस खौफ़नाक त्रासदी से भी बड़ा आश्चर्य तो जोस आर्केडियो का मेकोंडो में इंतज़ार कर रहा होता है। वह जब मेकोंडो पहुँचता है तो उसे पता चलता है कि मेकोंडो के लोगों को गोलीबारी में तीन हजार लोगों के मारे जाने की घटना के बारे में पता ही नहीं है। लोग उसकी बातों को महज कल्पना मानते हैं। राज्य, समाचार एजेंसियां, अख़बार, सेना, अदालतें सभी यही कहते हैं कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं। कि सभी श्रमिक हड़ताल ख़त्म कर ख़ुशी से अपने घरों को लौट गए थे। जोस आर्केडियो सेगुंदो इस रक्तरंजित यथार्थ को अकेले झेलने को अभिशप्त हो जाता है।

विडम्बना तो यह है कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों ने भी अपने नागरिकों के साथ ठीक ऐसे ही नरसंहार किए और बाद में उनके दोषियों को सजा देना तो दूर ऐसी किसी घटना के होने भर से भी इंकार कर दिया। भारत में हाशिमपुरा और मरिचझापी में हुए नरसंहार इसके उदाहरण हैं। उपन्यासकार अमिताव घोष ने मरिचझापी में हुए नरसंहार को पृष्ठभूमि में रखकर ‘द हंग्री टाइड’ शीर्षक से एक उपन्यास भी लिखा है। हाशिमपुरा पर विभूति नारायण राय की किताब ‘हाशिमपुरा 22 मई’ पढ़ते हुए भी जोस आर्केडियो सेगुंदो और मेकोंडो गाँव की त्रासदी याद आ जाती है। ज़रूर पढ़ें गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ का यह बेहतरीन उपन्यास।

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