100वीं पुण्यतिथि : देश की पहली फेमिनिस्ट, जिन्होंने हिंदू धर्म में हलचल मचाई, बाद में धर्म भी बदला

पंडिता रमाबाई (Pandita Ramabai) को देश की पहली फेमिनिस्ट कहा जाता है. आज के दिन यानि 05 अप्रैल को उनका मुंबई में निधन हुआ. उनके निधन को अब 100 साल हो रहे हैं. वो अपने जमाने विदुषी महिलाओं में थीं. पहले भारतीय विद्वान उन्हें सरस्वती कहते थे. फिर उन्होंने ऐसा विद्रोही अपनाया कि सबको चकित करते समय ना केवल अंतरजातीय विवाह किया बल्कि फिर धर्म भी बदल लिया. वो हिंदू से ईसाई बन गईं.

रमाबाई ने बचपन में ही अपने मां-बाप को खो दिया था. इसके बाद वो पूरे देश में घूमकर व्याख्यान देती रहीं. 22 की उम्र तक रमाबाई संस्कृत की प्रकांड विद्वान बन चुकी थीं. उन्हें कन्नड़, मराठी, बांग्ला और हिब्रू जैसी सात भाषाएं आती थीं. वो अपने समय की एक असाधारण महिला थीं. वह एक शिक्षक, विद्वान, नारीवादी एवं समाज सुधारक थीं.

पितृसत्तात्मक सोच की आलोचक

पंडिता रमाबाई 1870 के नागरिक समाज में एक बड़े विस्फोट की तरह मौजूद थीं. वह खासी पढ़ी लिखीं तो थीं लेकिन विद्रोही और तार्किक थीं. महिलाओं को लेकर हिंदू परिपाटियों और सोच की विरोधी थीं. पितृ सत्तात्मकता की कठोर आलोचक थीं. पहले तो पंडितों ने उन्हें सरस्वती कहा लेकिन जैसे ही वो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ बोलने लगीं और ईसाई धर्म को अपनाया, वैसे ही वो सभी के लिए विद्रोहिणी बन गईं.

तब लोग नाराज हो गए जब अंतरजातीय शादी की

जब वो कोलकाता में व्याख्यान के लिए पहुंची, तो उनकी बातों ने तत्कालीन विद्वानों और ब्राह्णणों को इतना प्रभावित किया कि उन्हें सरस्वती की उपाधि दे डाली गई. लेकिन जल्दी ही ये समाज तब कुपित हो गया, जब उन्होंने अंतरजातीय शादी की और रूढ़िवाद पर प्रहार किया.

क्यों इस शादी को लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे

1880 में उन्होंने गैर ब्राह्मण बंगाली वकील विपिन बिहारी से शादी कर ली. ये शादी इसलिए सही नहीं मानी गई, क्योंकि ना केवल ये अंतरजातीय थी बल्कि अंतर क्षेत्रीय भी, जो उस समय के लिहाज से किसी भूचाल की तरह था. इस शादी के दो साल बाद ही उनके पति का निधन हो गया लेकिन वो अपने पीछे एक छोटी बच्ची छोड़ गए.

फिर उन्होंने हिंदू परंपराओं और मान्यताओं पर सवाल उठाए

ये वो समय भी था, जब वो विद्रोही बन गईं. उन्होंने हिंदू धर्म की कई परंपराओं, मान्यताओं के साथ महिलाओं की स्थिति पर सवाल उठाने शुरू किए. वो तर्कों के साथ उसकी आलोचना करती थीं. उससे रूढ़िवादी तिलमिला गए. ये वो दौर था जब रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का काफी प्रभाव था. वो अक्सर कहती थीं कि भारतीय महिलाओं को ना केवल पढ़ाने लिखाने की जरूरत है बल्कि उन्हें टीचर्स और इंजीनियर बनाने की जरूरत है. भारत में ये वो दौर था जब महिलाओं का घर से बाहर जाना अच्छा नहीं माना जाता था.

पति की मौत के बाद पूना को बनाया घर

पति की मौत के कुछ साल बाद रमा पूना में बस गईं. यहां उन्होंने ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना की और लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया. ये संस्था बाल विवाह रोकने के लिए भी काम करती थीं. 1882 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में शिक्षा के लिए एक कमीशन बनाया तो रमा ने उसके सामने कई सबूत रखे. उन्होंने लॉर्ड रिपन के सामने रिपोर्ट दी.

फुले दंपति ने उनका खुलकर समर्थन किया

1883 में वो इंग्लैंड गईं. वहीं उन्होंने ईसाई धर्म का अध्ययन किया. उन्होंने तभी ईसाई धर्म स्वीकार किया. वो और उनकी छोटी बेटी ने 29 सितंबर 1883 को चर्च ऑफ इंग्लैंड में बपस्तिमा कराया. इसके बाद वो शैक्षणिक कामों में लग गईं. उसी दौरान उन्होंने वहां अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई की. इसके बाद ज़्यादातर लोगों ने रमा की आलोचना की. मगर एक जगह से रमा को खुलकर समर्थन मिला, ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले दंपति ने रमाबाई का खुलकर समर्थन किया.

लिखी मशहूर किताब

रमा ने अपने ब्रिटेन प्रवास में एक किताब लिखी, ‘द हाई कास्ट हिंदू विमेन’. इस किताब में एक हिंदू महिला होने के बुरे परिणामों की बात की. बाल विवाह, सती प्रथा, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर लिखा गया था. रमा ने शारदा सदन की मुखिया के तौर पर महाराष्ट्र में काफी काम किया. कर्नाटक के गुलबर्गा में एक स्कूल खोला. तमाम आलोचनाओं के बाद भी वो विधवाओं के उत्थान के लिए काम करती रहीं. उनकी किताब का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है. ये किताब भी आज भी चर्चित किताबों में है.

विवेकानंद से पूछा कि उनके देश में महिलाओं से दुराव क्यों

1886 में वो अमेरिका गईं. वहां लेक्चर देना शुरू किया. वो वहां कई साल रहीं. इसी दौरान जब स्वामी विवेकानंद शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में पहुंचे और उन्होंने हिंदू धर्म के महान पक्ष को दिखाते हुए अमेरिका में लेक्चर दिया तो उन्होंने पाया कि रमा बाई की अगुआई में वहां बहुत सी महिलाएं उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं साथ ही सवाल उठा रही हैं कि अगर उनका धर्म इतना महान है तो उनके देश में महिलाओं की इतनी खराब हालत क्यों है. विवेकानंद के भाषणों में महिलाओं को अनदेखी पर भी सवाल उठाए गए.

Leave a Reply