Chauri Chaura Incident: जानिए देश में क्या क्या बदल दिया था इस एक घटना ने

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Indian Freedom Movement) का इतिहास वैसे तो लंबा है, लेकिन 20वी शताब्दी में गांधी जी (Mahatma Gandhi) के भारत में आने के बाद का समय ज्यादा निर्णायक माना जाता है, लेकिन स्वतंत्रता के संघर्ष की नींव तो 1857 के समय से ही पड़ गई थी. आज देश इस आंदोलन की बहुत अहम घटना को याद कर रहा है जो 4 फरवरी 1922 को घटी थी. 1920 में शुरू हुए गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन ने पूरे देश को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा कर दिया था और अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गई थीं. लेकिन चौरीचौरा में हुई उस घटना (Chauri Chaura Incident) ने अगले 25 सालों की कहानियों की नींव बना दी.

असहयोग आंदोलन

गांधी जी की अगुआई में एक अगस्त 1920 को अंग्रेजी सरकार के लाए गए रोलैट एक्ट के विरोध में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था. इसमें लोगों से अंग्रेजी वस्तुओं का उपयोग बंद करने के साथ साथ अंग्रेजों का कर नहीं चुकाने को कहा गया. लोगों से कहा गया कि वे स्कूल, कालेज, न्यायालय और अंग्रेजी सरकार के दफ्तर नहीं जाएं. इस पहले देशव्यापी आंदोलन ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था.

क्या हुआ था चौरी चौरा में

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी चौरा में पहले यह खबर फैली कि वहां के पुलिस स्टेशन के दारोगा ने मुंडेरा बाजार में कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मारा है. इससे हुई प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पुलिस को लाठीचार्ज और फायरिंग करनी पड़ी. इसके बाद नाराज भीड़ ने थाने को घेर कर उस पर हमला किया और पूरे थाने को आग लगा दी जिससे तीन नागरिक और 22 पुलिसकर्मी मारे गए.

क्या हुआ इसका सबसे पहला नतीजा

इस घटना से गांधी जी बहुत आहत हुए, उन्होंने असहयोग आंदोलन ही खत्म करने का फैसला ले लिया. उन्हें कांग्रेस के अंदर ही इस फैसले के लिए विरोध का सामना करना पड़ा. उन्होंने दलील दी कि देश इस तरह की हिंसा से स्वतंत्र नहीं हो सकता है. आंदोलन बंद करने के बाद गांधीजी ने 16 फरवरी 1922 को अपने लेख ‘चौरी चौरा का अपराध’ में स्पष्ट किया कि अगर आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो दूसरी जगहों पर भी ऐसी घटनाएं होतीं.

अंग्रेजों की जिद में बदलाव

इस घटना के बाद अंग्रेज पहले से ज्यादा चौकन्ने हो गए. उन्होंने गांधी जी को गिरफ्तार तो किया, लेकिन उनके प्रभाव को देख कर ना तो उन पर दबाव डाल सके ना ही उन्हें भारत से बाहर जाने पर मजबूर कर सके. इसके अलावा अंग्रेजों ने भारत में शासन में भारतीय भागीदारी के लिए जरूरी बदलावों की अनुशंसा के लिए साइमन कमीशन बनाया.

कांग्रेस में गांधी जी का विरोध

इस घटना के बाद गांधी जी का खुल कर विरोध करने की हिम्मत तो किसी में नहीं थी. लेकिन कांग्रेस के अंदर ही अलग अलग स्वर सुनाई देने पड़ने लग गए. गांधी जी के जेल में रहते ही पार्टी दो दलों में बंटने लगी जिसके एक पक्ष वाले चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेता थे तो दूसरी तरफ चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे नेता थे. 1924 में गांधी जी के रिहा होने के बाद भी कांग्रेस लंबे समय एक रूप नहीं दिखी.

गांधी जी की शक्ति

चौरी चौरा कांड का एक बड़ा नतीजा यह भी रहा कि इससे देश में गांधी जी की ताकत कई गुना बढ़ गई. इसका उपयोग गांधी जी आगे नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में  बखूबी किया. जहां उनका सम्मान करने वाले उनके कहने पर चलने वालों की पूरी फौज खड़ी हो गयी. गांधी जी से अंग्रेज तक डरने लगे थे. वे उन्हें गिरफ्तार करना तो दूर उन्हें नजरबंद तक करने की नहीं सोच पाते थे.

क्रांतिकारियों का दौर

असहयोग आंदोलन ने देश के बड़े तबके में निराशा फैला दी. इसमें युवा वर्ग विशेष तौर पर शामिल था. इसी की वजह से देश में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, जैसे बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंसा का रास्ता अपनाया और 1920 के दशक में देश को कई क्रांतिकारी और उनके हैरतअंगेज कारनामों की घटनाएं दीं. लेकिन क्रांतिकारियों का यह दौर संगठनात्मक कमियों के कारण से लंबा नहीं चल सका.

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