विस्तार से : हमारे देश व प्रदेश में बढ़ती बाढ़ की समस्या, सरकार की सीमित सहायता

लेखक- गौतम कुमार

बिहार : आज जिस विषय पर चर्चा करने जा रहे है उस विषय का नाम है हमारे देश व प्रदेश में बाढ़ कि समस्या है एवं सरकार द्वारा सहायता , हम सभी जानते है कि हमारा देश कभी बाढ़ से तो सुखर की समस्या से जूझती आ रही है मानवीय त्रासदी इन दोनों पहलुओं का प्रतिफल है हालाँकि पूरी दुनिया इस प्रतिफल से अछूती नहीं है। कभी न कभी,किसी न किसी कालखंड में प्रत्येक देश ने प्रलयंकारी बाढ़ को झेला है।

वहीं हमारा देश भारत में भी उदाहरणों की कमी नहीं है जिसका वर्तमान समय हमसभी अपने ही आँखों से देख रहे है आज पूरा बिहार बाढ़ से ग्रसित है जब घर से निकलते है तो सिर्फ पानी ही पानी दिखाई देता है सभी बाढ़ पीड़ित व्यक्ति को जहाँ भी उचे जगह मिलते है वहाँ रहने लगते है हमें अभी भी वर्ष 2004 वाली बाढ़ का परिदृश्य याद है उस बाढ़ ने बिहारवासियों के जीवन को अस्त व्यस्त कर दी थी यह बाढ़ सन 2004 के जुलाई माह के पहले पखवाड़े में आई थी और सबसे ज्यादा उत्तर बिहार प्रभावित हुई थी इतना भयानक बाढ़ मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था| बिहार की बाढ़ों के बारे में अक्सर कहा जाता है और सत्य भी है कि नेपाल देश के द्वारा पानी छोड़ने के कारण बिहार में बाढ़ आ जाती है |इस कारण के मूल में भी नेपाल देश में पानी सहेजने की क्षमता और साधन की घोर कमी है क्योंकि नेपाल एक छोटा-सा पहाड़ी देश है और नेपाल देश की विवशता है कि अगर वह पानी नहीं छोड़ेंगे तो खुद डूब जायेगा इसलिए पानी छोड़ने के अलावा उसके पास अन्य कोई विकल्प है ही नहीं |

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मुझे लगता है कि नेपाल देश यदि पानी सहेजने के साधन विकसित कर लेते है तो बिहार राज्य और नेपाल देश के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी लेकिन भूविज्ञान के अनुसार तो नेपाल देश के क्षेत्र की चट्टानें कमजोर और कच्ची हैं इसलिए पूरी सावधानी के साथ जलाशय, जलमार्ग और बांध का निर्माण किया जा सकता है लेकिन भविष्य में कभी भी प्राकृतिक हलचल से टूट सकते हैं। ईश्वर करे कि न हो पर जिस दिन होगी निश्चय ही वह कयामत का दिन होगा।

उत्तर बिहार की बाढ़ को प्रभावित करने वाले मुख्य घटक है जिसे आगे कि कड़ी में जानने का प्रयास करेंगे |

  • हिमालय क्षेत्र में भारी बरसात के कारण नदियों के जल स्तर में वृद्धि होना |
  • नेपाल के पहाड़ी इलाकों का तीखा ढाल होना के कारण जल का का ठहराव न होना |
  • बाढ़ के पानी के साथ आने वाली गाद की भारी मात्रा के कारण किसानों को खेती करने में परेशानी होना |
  • मैदानी इलाके की मिट्टी की प्रवृति कच्ची होना |
  • बाढ़ के पानी का सुरक्षित तरीके से निकास न होना और न ही पानी को सहेजने कि क्षमता होना |

हम सभी जानते भी है और पढ़ते भी आ रहे है कि बिहार में बाढ़ आने के दो तरीके है एक गंगा नदी के जल स्तर में वृद्धि एवं दूसरी कोशी नदी के जल स्तर में जल वृद्धि होना | कोशी नदी तो हमेशा अपना दिशा और गति बदलती रहती है इसलिए कोशी नदी को बिहार का शोक नदी के नाम से भी जाना जाता है और कोसी नदी के बारे में कहा जाता है कि उसने पिछले कुछ सौ सालों में करीब 148 किलोमीटर के क्षेत्र में अपनी धारा बदली है।कहा जा सकता है कि समाज और सरकार को वर्तमान समय नदियों के स्वभाव के अनुसार जीवनशैली अपनाने और आधुनिक तकनीकों को लागू करने आवश्यकता है पर बिहारवासियों ने इन नदियों के पानी को बड़े-बड़े तालाबों में डालकर बाढ़ का वेग कम करने प्रयास किया है पहले बिहार में बड़े-बड़े तालाब बनाने की परंपरा थी।तालाबों को हृद और चौरा नाम से भी पुकारा जाता था। दरभंगा, परिहारपुर, भरवाहा और आलापुर के तालाब दो से तीन मील लंबे-चौड़े थे। इस तरह के तालाबों में बरसात के पानी को सहेजने का चलन था।

बिहार में रेन वाटर हारवेस्टिंग की व्यवस्था है परन्तु प्रयाप्त नहीं है |

साथियों इसके लिए सबसे पहले वस्तुस्थिति को समझना होगा और समाज व सरकार को फिर से समीक्षा करने होंगे और अंत में इसके लिए ठोस रणनीति तैयार करना होगा | बरसात के पानी के प्रबंध को सही तरीके से करने के बाद ही बाढ़ का इलाज किया जा सकता है।हम सभी जानते है कि बिहार की बाढ़ का नियंत्रण पूरी तरह प्रकृति के हाथ में है|

विजन फॉर इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट (फरवरी, 2003) में भारत सरकार के द्वारा कराए कामों में तटबंधों के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी तटबंधों के बाद जलाशयों का निर्माण दूसरे पायदान पर रखा था| भारत सरकार के जल संसाधन विभाग द्वारा पूरे देश में उपरोक्त सोच के आधार पर कार्य करती हैं।

हम सभी को देश में बाढ़ को चुनौती के रूप में लेना चाहिए क्योंकि चुनौती ही नए सोच को जन्म देती है,सही रह दिखाती है और लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती है | सब जानते हैं कि देश के हर बाढ़ की अपनी अलग पहचान होती है और यही अलग पहचान नियंत्रण और प्रबंधन के तौर तरीके तय करती है। आज इस पर विस्तृत चिंतन कि आवश्यकता है और केंद्र सरकार व राज्य सरकार को सभी से सुझाव लेकर इन विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए मुझे लगता है कि केंद्र सरकार व राज्य सरकार विचार करती है तो ही सकारात्मक रणनीति तय की जा सकती है |

बिहार में तीन सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित जिलों पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण और मुजफ्फरपुर माना जाता है |

साथियों हल ही में एक संयुक्त रैपिड नीड्स असेसमेंट सर्वे किया गया है इसमें पता चला है कि घर टूट गए हैं, शौचालय पानी में बह गए हैं, भूखमरी बढ़ रही है, फसलें बर्बाद हो गई हैं, मवेशी मारे गए हैं बिहार और बाढ़ के अन्य प्रभाव राज्य के 15 जिलों पर भी प्रभाव दिख रहे हैं जिसमे भागलपुर,खगड़िया,मुंगेर जिले भी शामिल है | बिहार बाढ़ 2021 के सर्वे के अनुसार 90% लोगों के पास न तो पीने का साफ पानी है और न ही खाने के लिए पर्याप्त में खाना और आधे से ज्यादा शौचालय क्षतिग्रस्त हो चुके है 33.5 प्रतिशत ने निजी स्नानघर ना होने की बात कही है हालाँकि बाढ़ की वजह से कोविड टीकाकरण में भी दिक्कतें आ रही हैं |

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स्वास्थ्य और शिक्षा संकट भी गहराता जा रहा है लगभग 76 प्रतिशत लोग संक्रामक रोगों से जूझ रहे हैं जबकि नौ प्रतिशत ने कोरोना पॉजिटिव होने की बात कही। कभी कभी सोचते है तो ऐसा लगता है कि बिहार में हर वर्ष बढ़ा आना एक परंपरा या त्यौहार बन चुका है और इस त्यौहार को मनाना सभी के लिए जरूरी हो गया है | लेकिन अभी भी बिहार के नदियों के जल स्तर में वृद्धि हो रही है जो चिंता का विषय है | हालाँकि बिहार सरकार का सम्बंधित विभाग इस नजर रख रही है और बिहार के मुख्यमंत्री आदरणीय श्री नितीश कुमार जी स्वंय हवाई सर्वेक्षण कर के स्थिति पर नजर रल्ह रही है |

इसके लिए बिहार सरकार ने भी बिहार बाढ़ राहत सहायता योजना 2021 शुरुआत किये है और ऑनलाइन आवेदन शुरू भी है और आवेदन ऑफलाइन के माध्यम से अधिकारी द्वारा प्रभावित व्यक्तियों,जान,माल की सूची तैयार की जाएगी|राज्य सरकार के द्वारा लाभ इन लोगों को सीधे बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से अंतरित की जाएगी ताकि योजना का लाभ डायरेक्ट प्रभावित व्यक्ति या प्रभावित परिवार को मिल सके और बीच में बिचौलियों की बात खत्म हो सके ।

इस योजना में बाढ़ प्रभावित परिवारों को कितना मिलेंगे आगे की कड़ी में जानेंगे |

  • बिहार बाढ़ प्रभावित परिवारों को ₹6000 का लाभ मिलेंगे ।
  • कपड़ा का नुकसान होने पर ₹1800 रुपए मिलेंगे |
  • बर्तन के लिए ₹2000 मिलेंगे |
  • ₹6800 रुपए प्रति हेक्टेयर फसल के लिए मिलेंगे |
  • ₹30000 प्रति गाय भैंस की छती होने पर मिलेंगे |
  • ₹25000 प्रति घोड़ा की छती पर मिलेंगे |
  • ₹3000 प्रति भेड़ ,बकरी ,सूअर की छती पर मिलेंगे |
  • ₹95100 पक्का मकान कच्चा मकान नुकसान पर मिलेंगे |
  • ₹50 प्रति मुर्गी नुकसान पर अधिकतम ₹5000 देय होगा ।
  • ₹5200 रुपए पक्का मकान के आंशिक क्षतिग्रस्त होने पर मिलेंगे |
  • ₹3200 रुपए कच्चा मकान के आंशिक क्षतिग्रस्त होने पर मिलेंगे |
  • ₹2100 रुपए जानवर के शेड नुकसान होने पर
  • ₹4100 झोपड़ी का पूर्ण नुकसान होने पर

सन 1954 के बाद से 16,000 किलोमीटर तटबंध और 32,000 किलोमीटर ड्रेनेज चैनल का निर्माण किया है। इसके अलावा 906 शहरों की बाढ़ से सुरक्षा की व्यवस्था की गई और 4,706 ग्रामों को बाढ़ के संभावित अधिकतम स्तर के ऊपर बसाया गया है। इन प्रयासों ने बाढ़ संभावित 40 मिलियन हेक्टेयर इलाके में 400 अरब रुपयों की लागत से 14 मिलियन हेक्टेयर इलाके को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षा उपलब्ध कराई है। इन प्रयासों के अलावा अनुपूरक गतिविधियों के अंतर्गत बाढ़ की पूर्व सूचना एवं चेतावनी देने की व्यवस्था की मदद से बाढ़ जनित कष्ट कम किए हैं।

सेन्ट्रल वाटर कमीशन (सीडब्ल्यूसी) का बाढ़ सूचना तंत्र देश की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय नदी घाटियों में कार्यरत है। सीडब्ल्यूसी के 157 पूर्व सूचना केन्द्र बांधों के संचालन की जानकारी प्रदान करते हैं। इनमें से सबसे अधिक सूचना केन्द्र 109 गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं मेघना नदी घाटी में हैं। पश्चिम की ओर बहने वाली नदी घाटियों में 15, गोदावरी नदी घाटी में 13, कृष्णा नदी घाटी में 8, महानदी घाटी में 3 और पूर्वी नदी घाटियों में 9 सूचना केन्द्र मौजूद हैं। चंबल व महानदी घाटी में सूचना प्रदान करने के लिए वीसेट की आधुनिक व्यवस्था की गई है।

भारत में बाढ़ को नियंत्रित करने एवं उसका प्रबंध करने की शुरुआत 1954 की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद से हुई है। सन 1954 के नीतिगत वक्तव्य के उपरांत 1957 में उच्च स्तरीय कमेटी का गठन हुआ। बाढ़ नियंत्रण, बाढ़ राहत इत्यादि के लिए समय-समय पर अनेक समितियों का गठन किया गया, फिर सन 1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग का गठन किया गया। राष्ट्रीय जल नीति ने बाढ़ों के नियंत्रण और प्रबंध के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।

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राष्ट्रीय कमीशन फॉर इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्स डेवलपमेंट प्लान (1999) ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों को बाढ़ से पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराना संभव नहीं है, इसलिए देश को बेहतर बाढ़ सुरक्षा के स्थान पर बाढ़ प्रबंध की नीति पर काम करना चाहिए। तटबंधों से पर्याप्त बाढ़ सुरक्षा मिलती है पर तटबंधों के प्रदर्शन का आकलन कर बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए उनकी डिजाइन, निर्माण और रखरखाव में उपयुक्त सुधार करना चाहिए। बाढ़ों की पूर्व सूचना और चेतावनी देने के लिए सूचना केन्द्रों के नेटवर्क को पूरे बाढ़ संभावित इलाके में स्थापित करना चाहिए।

इंडियन वाटर रिसोर्सेज सोसाइटी (आईडब्ल्यूआरएस) के बाढ़ और सूखे पर प्रकाशित थीम पेपर (2001) के अनुसार बाढ़ प्रबंध के समस्त उपायों को संरचनात्मक उपाय और गैर-संरचनात्मक उपायों में वगीकृत किया जा सकता है|

बाढ़ के दौरान गैर-संरचनात्मक उपायों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और इस भूमिका का जिला प्रशासन, राज्य एवं केन्द्र सरकार निर्वाह करते हैं। भारत में बाढ़ संभावित इलाकों में करोड़ों लोग निवास करते हैं और उन इलाकों में अनेक गतिविधियों का संचालन किया जाता है, इसलिए गैर-संरचनात्मक उपायों की भूमिका दिन प्रतिदिन अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।

ब्रह्मपुत्र, मेघना, गंगा, यमुना, सोन, गंडक, कोसी, राप्ती, महानंदा, झेलम, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि नदियों में अक्सर बाढ़ आती है। बाढ़ के कारण उनके किनारे के बाढ़ प्रभावित इलाकों और डेल्टा क्षेत्रों में भारी तबाही मचती है। इसी तरह मोकामा के पास का तस्तरी के आकार का प्राकृतिक इलाका अक्सर बाढ़ की चपेट में रहता है। अधिकांश बाढ़ें जुलाई से सितंबर के बीच दक्षिण पश्चिम मानसून के असर से आती हैं।हर साल बाढ़ में औसतन 1600 लोग और लगभग 94000 जानवर मरते हैं। यह सही है कि नुकसान के आंकड़े यद्यपि हर साल बदलते रहते हैं और त्रासदी की कहानी देश के किसी न किसी भाग में हर साल दुहराई जाती है

कोसी की सबसे ताजी तबाही सन 2008 में 18 अगस्त को नेपाल के सुनसारी जिले में कोसी के पूर्वी तटबंध के टूटने से उत्तरी बिहार में हुई। कुसहा स्थित इस तटबंध के टूटने से आई प्रलयंकारी बाढ़ ने बिहार के पांच जिलों (मधेपुरा, अररिया, सहरसा, पूर्णिया और सुपौल) के 34 विकास खंडों में बसे 979 ग्रामों के 30 लाख लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है,10 लाख पशुओं की मौत हुई है।तीन लाख दस हजार से अधिक मकानों को नुकसान हुआ है और लगभग 1,25,000 हेक्टेयर में खड़ी फसल तबाह हुई है।

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कोसी के टूटे तटबंध से निकले बाढ़ के पानी का फैलाव लगभग 150 किलोमीटर लंबे और 30 किलोमीटर चौड़े इलाके में था। लगभग 15 दिन के असर दिखाया था। अनुमान है कि इस बाढ़ के कारण बिहार का विकास पांच साल पीछे चला गया है |सन 1976, 1999 और 2008 के सेटेलाइट चित्रों को देखने से पता चलता है कि कुसहा तटबंध के पास के इलाके में कोसी नदी का जल मार्ग पूर्व की ओर खिसक रहा है। सन 1963 के बाद से कोसी पर विभिन्न स्थानों पर बने तटबंधों के टूटने की घटनाएं सन 1963, 1968, 1971, 1980, 1984, 1987 और 1991 में हुई हैं।

बाढ़ नियंत्रण और बाढ़ के प्रबंध के सरकारी सोच की दिशा को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

  • बाढ़ से सुरक्षा जिसके अंतर्गत तटबंधों, नदी के रास्ते में बाढ़ के पानी को सहेजने के लिए जलाशयों का निर्माण, नदी की बाढ़ क्षमता का विकास इत्यादि निर्माण कार्य किए जाते हैं।
  • नदी के बाढ़ क्षेत्र में संपति एवं विकास कार्यों की सुरक्षा के लिए प्रयास किए जाते हैं।
  • नुकसान को कम करने के लिए कार्यवाही की जाती है और
  • बाढ़ की विभीषिका के साथ तालमेल कर जिंदगी बसर की जाती है।

भारत सरकार ने तटबंधों को बाढ़ सुरक्षा के कारगर हथियार के रूप में मान्यता प्रदान कीये है इसीलिए हिमालयी नदियों के संवेदनशील बिंदुओं पर मुख्य रूप से तटबंधों का निर्माण किया गया है।
हम सभी जानते है कि किसी योजना में अच्छियाँ भी होती है कुछ खामियां भी होती है जो आगे कड़ी में इस पर चर्चा करेंगे |

तटबंधों की खामियां निम्नानुसार है-

  • वे बाढ़ के साथ आने वाली सिल्ट को खेतों में जमा होने से रोकते हैं खेतों में सिल्ट जमा नहीं होने के कारण खेतों को उपजाऊ मिट्टी और पोषक तत्व नहीं मिल पाते, उपयोग में लाए तत्वों की क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती, उनकी प्राकृतिक उत्पादन क्षमता घटती है और खेती की लागत बढ़ती है।
  • तटबंधों की लक्ष्मण रेखा को लांघकर फैले बाढ़ के पानी के कारण अस्थायी वाटरलागिंग की परिस्थितियां पैदा होती हैं, फसलें खराब/नष्ट होती हैं, जनजीवन प्रभावित होता है, प्रभावित लोगों की माली हालत ठीक होने और व्यक्तिगत नुकसान की भरपाई में बहुत समय लगता है। पानी से संबंधित बीमारियां फैलती हैं।
  • तटबंधों के टूटने के कारण बाढ़ से होने वाला नुकसान कई गुना अधिक बढ़ जाता है। खेतों में रेत, बजरी और पत्थर भरने से खेतों की उत्पादकता घट जाती है। नदी के पाट और तटबंध के बीच के इलाके में रेत, बजरी और पत्थर इत्यादि जमा होने के कारण नदी के पाट की ऊंचाई बढ़ जाती है।
  • नदी के पाट की ऊंचाई बढ़ने से नदी घाटी का प्राकृतिक भूमि कटाव चक्र (बेस लाइन आफ इरोजन) असंतुलित हो जाता है। प्राकृतिक भूमि कटाव चक्र असंतुलित होने से नदी की मार्फालाजी बदलती है और नए-नए इलाकों में बाढ़ का प्रकोप प्रारंभ हो जाता है।
  • तटबंधों के टूटने से मकान, स्कूल, सड़कें और विकास कार्य इत्यादि को क्षति पहुंचती है। उनको फिर से बनाने पर धन खर्च करने के कारण सामान्य विकास के कामों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नदी विज्ञान को समझने वाले जानते हैं कि उद्गम से लेकर समुद्र में मिलने तक का नदी का सफर, कुम्हार के चाक पर रखी गीली मिट्टी की नवनिर्माण यात्रा की तरह है।

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हर साल महीन मिट्टी की परत पर दूसरी परत चढ़ाती है, धरती को शस्य श्यामला बनाती है। नदी मार्ग में जमा भारी सामग्री को विखंडित करती है, उनका आकार कम करती है और फिर उन्हें महीन कणों में बदलकर डेल्टा के माध्यम से समुद्र को सौंप देती है। प्रकृति ने नदी को यही काम सौंपा है इसलिए जब तक नदी अपना आंगन (घाटी) नहीं संवारती, अपने आंगन को अंतिम स्वरूप नहीं देती, तब तक उसका काम अधूरा रहता है। यही नदी का काम है और यही काम उसे

कहा जाता है कि कोसी नदी की बाढ़ में हर साल बहकर आने वाली सिल्ट और कंकड़ पत्थर का आयतन 94,000 एकड़ फीट है। दूसरे शब्दों में यदि जलमार्ग में तटबंध और बांध नहीं बनें तो पूरे कछार के खेतों को महीन उपजाऊ मिट्टी मिल जाएगी और बड़े कंकड़ पत्थर नदी के पाट की लक्ष्मण रेखा के अंदर रहेंगे और साल-दर-साल छोटे होते हुए समुद्र में समा जाएंगे।
जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात की मात्रा, उसकी तीव्रता और निरंतरता में आ रहे बदलावों को लोग स्वीकारने लगे हैं। सन 2008 की कोसी की बाढ़ ने तो एक ही बांध से पानी छोड़ने और एक ही तटबंध के टूटने का कहर दिखाया है।

लेखक का यह निजी विचार है

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