वर्तमान में भी खेती-किसानी में लॉक डाउन के हालात, सरकार की बेरुखी बरकरार

UP: मौजूदा समय गन्ने की खेती का सबसे उचित समय है। अधिकांश फसल की गुड़ाई, जुताई, निराई, सिंचाई चल रही है। सिंचाई के साथ ही खाद डालनी होती है लेकिन खाद नदारद है। इसका कारण खाद उत्पादक कंपनियों का 1 अप्रैल को रेट बढ़ाना है। यह बढ़ोतरी सामान्य नहीं बल्कि 45 से 58 फीसदी तक है। इसमें सबसे अधिक डीएपी पर 58 फीसदी की बढ़ोतरी है। सहकारी समितियों में अधिकतर इफको और कृभको की खाद मिलती है। किसान भी इन्हीं कंपनियों की खाद पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। बताते हैं कि इफको की डीएपी 1,200 से सीधे 1,900 होने जा रही है तो कृभको सहित कुछ कंपनियों की 1,700 की।

पिछली बार के लॉक डाउन में अर्थव्यवस्था को थामने वाला कृषि क्षेत्र इस बार बेदम है। इस बार खेती-किसानी में भी लॉक डाउन के हालात बन गए हैं। किसानों पर चौतरफा वार हो रहा है और इसकी वजह प्राकृतिक से लेकर इंसानी भी है। जिस समय सरकार को कृषि क्षेत्र का सहारा बनना चाहिए था, उस समय उसे बेरुखी का ही सामना करना पड़ रहा है। डीएपी की कीमतों में आग लगी हुई है और ऐसे में लाचार किसानों के सामने सड़क पर उतरने के अलावा शायद कोई चारा नहीं। लेकिन क्या सरकार के लिए यह चिंता की बात नहीं!

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बारिश न होने से पिछली फसलों- गेहूं, जौ, मसूर, अरहर, चना, अलसी आदि का उत्पादन प्रभावित हो गया। गन्ने का भुगतान काफी हद तक बकाया है और अगली फसल के लिए रासायनिक खाद- डीएपी, एनपीके, पोटाश, यूरिया आदि का महीनों से टोटा है। किसान खाद के लिए सहकारी समितियों के चक्कर लगा रहे हैं जहां पखवाड़ा, सप्ताह और दो-चार दिन में खाद आने के आश्वासन की घुट्टी लेकर लौट रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। ज्यादातर किसान गन्ने की पेड़ी फसल काटकर गेहूं की बुआई करते हैं। प्रदेश में कुछ चीनी मिलें समय से चलीं तो अधिकतर देरी से चलीं। इसका असर यह हुआ कि गेहूं की बुआई लेट हो गई। वैसे, गेहूं बुआई का उचित समय नवंबर बताया जाता है लेकिन जब मिलें नवंबर अंत या कई तो उससे भी लेट चलीं तो गेहूं बीजने में देरी होना स्वाभाविक था। पहले लेट बुआई, फिर सिंचाई के समय ऊपर से पानी न गिरने का नतीजा यह रहा कि गेहूं का उत्पादन आधा रह गया।

पेड़ी काटकर बीजे गए जिन खेतों में चार-पांच क्विंटल बीघा गेहूं हो जाता था, उनमें दो-ढाई से लेकर अधिकतम तीन क्विंटल बीघा तक गेहूं तिरा। आसमानी बारिश न होने का असर जौ, मसूर, अरहर आदि दूसरी फसलों पर भी पड़ा है लेकिन जब पिछैती फसल पककर तैयार हुई तो उठने के दौरान तीन बार बारिश हो गई। इससे फसल उठाने में दिक्कत पेश आई। साथ ही कुछ फीसदी फसल को नुकसान भी हुआ। हालांकि सरकार ने 2021-22 के लिए गेहूं का एमएसपी 1975 रुपये क्विंटल घोषित कर रखा है।

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प्रदेश सरकार 1 अप्रैल से गेहूं खरीद भी रही है जिसका 4,600 करोड़ रुपया किसानों के खाते में भेजने का दावा कर रही है। पिछले साल सरकार ने 5.5 मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा था लेकिन खरीद 3.5 मीट्रिक टन ही हुई थी। सरकारी खरीद की गंभीरता इसी बात से झलकती है कि इस साल उसने खरीद का कोई लक्ष्य ही नहीं रखा है। लिहाजा किसान ने जो फसल उपजाई भी है, वह कितनी सरकारी खरीद केंद्रों पर बेच पाएगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। उसमें भी बहुत से खरीद केंद्रों का कागजों पर खुलना और असली दिखाई जाने वाली खरीद में भी नेता-अफसर-माफिया का गठजोड़ अपना काम करता है।

ऊपर जैसा बताया गया कि उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। पेराई का सीजन अक्टूबर से सितंबर तक का होता है। भाजपा शासित योगी राज में तीन सीजन से राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में धेले की बढ़ोतरी नहीं हुई है। 12 मई तक उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि चालू सीजन का 11872.70 करोड़ रुपया किसानों का चीनी मिलों पर बाकी है। हालांकि किसानों के बकाया मामले में सभी मिलों को एक नजरिये से देखना उचित नहीं होगा।

प्रदेश के गन्ना मंत्री के इलाके पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की मलकपुर स्थित मोदी समूह की मिल ने शून्य भुगतान किया है, वहीं अवध क्षेत्र के बहराइच जनपद के परसेंडी स्थित मिल ने 99.95 फीसदी भुगतान कर दिया है। बकाये के मामले में चीनी निगम और राज्य सरकार के प्रबंधन वाली सहकारी चीनी मिलें भी कम भुगतान करने वाली श्रेणी में अपना स्थान बनाए हुए हैं। औसतन देखें तो उनकी स्थिति निजी मिलों से भी बदतर है। जब बकाया भुगतान की बात आती है तो निजी मिलों की हीलाहवाली की बात करके सरकारें मामले को टालने का प्रयास करती हैं लेकिन अपने प्रबंधन वाली मिलों की बात नहीं करतीं।

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इससे यह भी पता चलता है कि वह खुद भी गन्ना किसानों का बकाया भुगतान समय पर हो, इसको लेकर गंभीर नहीं है। योगी सरकार की गंभीरता का पैमाना इससे भी मापा जा सकता है कि जिस मायावती सरकार में राज्य परामर्श मूल्य में 12 से 24 फीसदी की और अखिलेश सरकार में 9 और 17 फीसदी की बढ़ोतरी होती है, उसी राज्य की मौजूदा योगी सरकार में महज 3 फीसदी की बढ़ोतरी होती है। यह बात अलग है कि देश की राजधानी दिल्ली में मेट्रो से लेकर हर बस स्टाप पर चार साल में रिकॉर्ड भुगतान का धुआंधार प्रचार किया जाता है। सवाल उठता है कि जब चीनी के बाजार की स्थिति समूचे देश में एक समान है। तब क्या कारण है कि उत्तर प्रदेश अपने किसानों को 62.29 फीसदी भुगतान कर पाता है जबकि उससे कम समय में महाराष्ट्र 92.4 फीसदी भुगतान कर देता है।

अब बात अगली फसल में रासायनिक खाद के इस्तेमाल और उसकी उपलब्धता की। मौजूदा समय गन्ने की खेती का सबसे उचित समय है। अधिकांश फसल की गुड़ाई, जुताई, निराई, सिंचाई चल रही है। सिंचाई के साथ ही खाद डालनी होती है लेकिन बीते 1 अप्रैल से समितियों से खाद नदारद है। इसका असली कारण खाद उत्पादक कंपनियों का 1 अप्रैल को रेट बढ़ाना है। यह बढ़ोतरी सामान्य नहीं बल्कि 45 से 58 फीसदी तक बताई जाती है। इसमें सबसे अधिक लोग डी-अमोनियम फास्फेट (डीएपी) पर 58 फीसदी की बढ़ोतरी बता रहे हैं। सहकारी समितियों में अधिकतर इफको और कृभको कंपनियों की खाद मिलती है।

किसान भी इन्हीं कंपनियों की खाद पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। इन कंपनियों की खाद के कट्टे पर कितनी बढ़ोतरी हुई है, उसके बारे में लोग अपना-अपना आंकड़ा बता रहे हैं। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इफको की डीएपी 1,200 से सीधे 1,900 होने जा रही है तो कृभको सहित कुछ कंपनियों की 1,700 की। कोरोना काल में इस बढ़ोतरी के लिए कंपनियां तर्क दे रही हैं कि पिछले छह महीने में कच्चे माल की कीमत में बड़ा उछाल आया है। ऐसे में उनके पास रेट बढ़ाने के अलावा विकल्प नहीं। सरकार के स्तर पर भी रेट को लेकर अब तक कोई फैसला नहीं हो सका है। लिहाजा प्रदेश की सभी साधन सहकारी समितियों में खाद के नाम पर ताला लटका है। किसान की गन्ने की फसल की हरियाली पीलेपन में बदल रही है। वह समितियों के चक्कर लगा रहा है।

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लखीमपुर खीरी जिले के मुखलिसपुर निवासी मनोहर यादव हसनपुर कटौली, फिरोजाबाद, रूद्रपुर, खमरिया आदि समितियों का चक्कर लगाकर परेशान हो चुके हैं। वह निजी दुकान से यूरिया और एनपीके डालने को विवश हुए हैं। खाद उन्होंने अवश्य डाल दी है लेकिन शंका के साथ बताते हैं कि निजी दुकानों पर पता नहीं कौन-कौन सी खाद है, उस पर क्या भरोसा किया जाए क्योंकि अधिकांश बार गच्चा ही खाने को मिला है। मनोहर यादव महज उदाहरण हैं।

यह कहानी उत्तर प्रदेश ही नहीं, दूसरे राज्यों के किसानों की भी होगी लेकिन सरकार के स्तर पर कौन पूछनहार है। याद कीजिए, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान जब वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने दो रुपये किलो यूरिया बढ़ाने की बात की थी तो समूचे विपक्ष ने किस तरह सरकार को घेर लिया था। मजबूर होकर वाजपेयी सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े थे। लेकिन कोरोना काल में किसानी की रीढ़ मानी जाने वाली डीएपी खाद का 58 फीसदी तक रेट बढ़ाने की बात की जाए लेकिन उसके लिए कोई आवाज उठाने वाला तक नहीं है।

यह लेख अटल तिवारी जी के फेसबुक अकाउंट से लिया गया है.

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