किसान आंदोलन : 9 महीने बाद भी मोदी सरकार की बेरुखी बरकरार

नई दिल्ली: किसान आंदोलन : किसान को अन्नदाता यूं ही नहीं कहा जाता है, किसानों को हमेशा एक दयालु ह्रदय का इंसान माना गया है, उदाहरण भी आसान है कि जब किसान खेत में बीज बोता है तो हमेशा फसल से अधिक ही बोता है ताकि उसके खेत से बीज खाने वाले पक्षी या जानवर का भी पेटभर सके, मगर इस आंदोलन ने किसान को अपने तेवर बदलने पर मजबूर किया है। किसान आंदोलन हाल ही का एक सबसे बड़ा आंदोलन ऊभर कर सामने आया है जो ना कोरोना से ड़रा है और ना ही सरकार के लाठीबाजों से। वो डटा रहा है भारी बारिश में, सर्दी-गर्मी में। किसान आंदोलन को 9 महीने हो गए है इस बीच कईं बार सरकार ने किसानों से बातचीत की लेकिन हर बार नतीजा शून्य ही रहा।

ना सरकार अपने फैसले से हटी और ना ही किसान डगमाए, नतीजे काफी बार भयानक भी हुए। कईं किसानों ने अपनी जान से हाथ धोया, कई किसानों ने आत्महत्या भी की मगर वो अपने आंदोलन के पथ से नहीं हटे। इस 9 महीने के अंतराल में किसानों को बदनाम करने की भी भरपूर कोशिश की गई, किसानों को उपद्रवी कहा गया, किसानों को देशद्रोही भी करार दिया, मगर किसानों का मन नहीं बदला , वह लगातार आंदोलन करता रहा, और शायद करता भी रहेगा , जब तक कोई नतीजा नहीं आता है। 26 जनवरी 2021 को जो हुआ वो सबके सामने था, मगर देश के कुछ ठेकेदारों ने इसे इस तरह से पेश किया कि किसानों की छवि को धूमिल कर दिया, किसानों का ना इरादा देश का दिल दुखाने का था और ना ही देश की छवि पर दाग लगाने का।

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मगर किसानों की भीड़ में कुछ गद्दारों ने देश के किसानों पर कलंक का काम किया। किसानों पर हाल ही कि सरकार ने विपक्ष से पैसे लेकर आंदोलन को बढ़ाने का आरोप भी लगाया, मगर नतीजा सबके सामने है। आज भी किसान अपने हक के लिए खड़े है। 28 अगस्त 2021 को किसानों पर करनाल में लाठीचार्ज किया गया है। यह प्रदर्शन सीएम मनोहर लाल खट्टर के विरोध का था, तभी शनिवार को बड़े स्तर पर लाठीचार्ज हुआ. करनाल के एसडीएम आयुष सिन्हा का सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल भी हुआ जिसमें वह किसानों का सिर फोड़ने की बात कर रहे थे। बताया जा रहा है कि इस लाठीचार्ज में तकरीबन 10 किसानों को चोट लगी है जिनमें 1 किसान की सदमे से मौत हुई है। लेकिन अब वो होने वाला जो शायद इस सरकार के लिए सही नहीं होगा।

5 सितंबर 2021 को किसानों की महापंचायत होने वाली हैं,जो मुजफ्फरनगर में होने वाली है। इस महापंचायत में भारी भीड़ जुटने वाली हैं , हर राज्य के किसान इस पंचायत का हिस्सा बनेगे,जिसमें हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड,तेलंगाना सहित कईं प्रदेशी राज्य भी शामिल है। यह पंचायत कृषि कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन के मिशन को यूपी की दिशा तय करेगी। किसानों को यूपी विधानसभा चुनाव से बेहद उम्मीद हैं।अब देखना यह होगा कि किसानों की यह लहर इस सरकार की कुर्सी को किस तरह से हिला कर गिराएगी ।

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9 महिनों से किसान आंदोलन चल रहा है इन 9 महिनों में इस सरकार ने किसानों की कोई बात नहीं सुनी है, जिस कारण किसान नेताओं का आरोप है कि सरकार सत्ता के नशे में चूर है, और यह उद्योगपतियों की सरकार है ,इसलिए किसानों की बात को ना सिर्फ अनसुना किया जा रहा है बल्कि इनके प्रदर्शन को मीडिया, पुलिस और लठेतों के जरिए कुचलने का प्रयास भी किया गया है।

इसके साथ किसान नेताओं का कहना है कि इस सत्ता के नशे में चूर सरकार को सिर्फ वोट की चोट से ही हराया जा सकता है। 2024 में होने वाले प्रधानमंत्री के चुनाव को सेमीफाइनल कहा जा रहा है और 2022 के यूपी विधानसभा में किसान इस सरकार को धारशायी करना चाहती है,जिसकी शुरुआत यूपी से ही होगी। जिसके लिए 5 सिंतबर को महापंचायत होने वाली है जो एक नई रणनीति तय करेगी।

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