हरियाणा: बालिका शिक्षा पर गांधी फेलोज का सर्वे, आज भी जाना पड़ता है कोसो दूर

हरियाणा: पिछले दिनों सक्षम बिटिया अभियान को लेकर हरियाणा के नूंह जिले में पीरामल फाउंडेशन के गांधी फेलोज द्वारा एक छोटा सा सर्वे किया गया। सर्वे का सेंपल काफी छोटा था, शायद जरूरत से ज्यादा। लेकिन असल समस्या का पता लगाने के लिए आपको कुछ लोगों से मिलना भर काफी होता है। पूरे जिले से कुल 600 सेंपल लेने का लक्ष्य रखा गया था जो आसानी से प्राप्त कर लिया गया। इसमें तावडू तहसील का सर्वे मैं कर रहा था जहां मुझे अपने एक साथी के साथ 80 नमूने लेने थे। इस सर्वे में 5वीं से 8वीं कक्षा की छात्राओं या 10-13 की उम्र में पढ़ाई छोड़ चुकी बच्चीओं को शामिल किया गया।

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उच्च शिक्षा के जाना पड़ता है दूसरे गांव

अभी तक इस सर्वे में ये निकलकर आया कि एक तो अभिभावक इस बात से चिंतित हैं कि बच्ची अगर पढ़ने दूसरे गांव या शहर जाती है तो यात्रा कैसे करे। अगर परिवार के पास पैसा है भी उसे दूर भेजने को लेकर तो उसकी सुरक्षा एक अहम मुद्दा निकलकर आता है। कई बच्चियां 8वीं के बाद से घर पर हैं और अपनी शादी की प्रतिक्षा कर रही हैं। कुछ किस्से तो ऐसे मिले जिनमें 10 साल की बच्ची का अबतक किसी भी विद्यालय में प्रवेश ही नहीं हुआ है। उनके माता-पिता इस बात पर स्पष्टिकरण ये देते हैं कि 2 साल से लॉकडाउन है लेकिन विद्यालयों में उन सबका प्रवेश 5 वर्ष मे हो जाना चाहिए था।

इस सबमें जब हम वालंटियर बनाने के लिए 12वीं पास बालिकाओं की खोज कर रहे थे तो कुछ ऐसे परिवार भी मिले जो अपने समाज और अपनी आर्थिक स्थिति का परवाह किए बिना बच्चियों को स्कूल अथवा कॉलेज भी भेज रहे हैं। इस सब में मेरा एक अवलोकन एवं खोज ये रही कि मेयो (मुस्लिम) बालिकाओं की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं, कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो। लेकिन वहीं हिंदू परिवार इस मामले में जागरुक हैं।

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मैने कहीं भी धार्मिक चश्मों का प्रयोग नहीं किया है, जो लिखा है वो केवल सच है। चुंकि हम लोकतंत्र में रहते हैं इसलिए आपमें से किसी को लगे कि ये मेरे निजी विचार हैं तो आप लोग इस बात पर भी आगे बढ़ सकते हैं।

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