Hool Diwas: एक पूरे परिवार की आज़ादी में दी गयी बलिदानी की कहानी

नई दिल्ली: वीरता किसी को विरासत में नहीं मिलती बल्कि इसे पालने में लोरियों और कहानियों के साथ अपने कर्मों और निष्ठा से नए पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। इस कथन को कितने हीं लोगों ने सच किया है और उन्ही में से एक हैं चुन्नी मांझी। इन्होंने भारत को ऐसे छः रत्न दिए जो भारत के स्वतंत्रता की प्रथम लड़ाई के नायक बनने वाले थें। इन रत्नों का नाम है , सिदो, कान्हो,चाँद, भैरव,फुलो और झनो। आज हूल दिवस (HOOL Diwas) है यानी अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ भारत का पहली क्रांति का दिन जिसमें लगभग 20 हज़ार आदिवासियों ने मृत्यु को चुना लेकिन पराधीनता उन्हें स्वीकार न थी।

वर्तमान झारखंड के संथाल परगना जिसे अंग्रेजों ने कभी दमिन ए कोह कहा था जो कि बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा रही थी, में जन्में सिदो कान्हो ने अंग्रेजों के तोपों और आधुनिक हथियारों के सामने अपने तीर-धनुष को कभी कमतर नहीं आँका और यही कारण था कि अंग्रेज व जमींदार इनके डर से कांपते थें।

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क्या कहते है इतिहासकार

इतिहासकार डॉक्टर डी एन वर्मा कहतें हैं कि लंबे समय से संथाल के लोग इस बात से असंतोष में थें कि अब जंगलों में रहने वाले लोगों से भी मालगुज़ारी लिया जाएगा और ताबूत में आखिरी कील का काम किया महिलाओं के साथ अत्याचार।अब संथालों के सब्र की सीमा टूट चुकी थी और इसी का परिणाम होता है हूल विद्रोह।

30 जून,1855 को सिदो,कान्हो,चाँद,भैरव,फुलो एवं झानों के नेतृत्व में साहेबगंज जिले के भोगनाडीह में 400 गाँवों से लगभग 40 हज़ार आदिवासियों ने अंग्रेजों को मालगुज़ारी देने से साफ इनकार कर दिया। इस दौरान सिदो ने ‘करो या मरो,अंग्रेज हमारी माटी छोड़ो’ का नारा दिया। इसी आंदोलन में सिदो को राजा, कान्हो और चाँद को मंत्री,भैरव को सेनापति चुना गया। सिदो अपने लोगों को एक करने के लिए सभी को अपने दैवीय शक्ति का हवाला देते हुए ,साल की टहनी भेजा करते थे।

मालगुज़ारी न मिलने से बौखलाए अंग्रेज़ी सरकार ने वहाँ मार्शियल लॉ लगा दिया और चारो भाइयों को तुरंत गिरफ्तार करने का आदेश दिया । गिरफ्तार करने आये आये दारोगा का संथाल विद्रोहियों ने गला काटकर हत्या कर दी। इस से अंग्रेज़ी हुकूमत में आतंक छा गया।

संथालों के भय से जनरल लायर्ड ने पाकुड़ में मार्टिलों टावर का निर्माण करवाया जो कि आज भी पाकुड़ में स्थित है।अंततः अपने के धोखे से ही सिदो और कान्हो को पकड़ा गया और उन्हें फाँसी दे दी गयी। सिदो कान्हो की मृत्यु ने संथालों में आग में घी का काम किया जैसे राजा के मौत के बाद मंत्री और सेनापति को सारा कार्य का जिम्मा अपने सर लेना होता है बिल्कुल ऐसा ही हुआ। चाँद और भैरव ने भी आखिरी सांस तक जल,जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ी। और फिर जो हुआ वो हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है फुलो और झानों सर पर पगड़ी बांध अपने लोगों का नेतृत्व किया और अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिये।

इस भयंकर मुठभेड़ में संथालो हार हुई क्योंकि ये लोग तीर धनुष से लड़ रहे थे जबकि अंग्रेजो के पास आधुनिक हथियार था। सिदो को अगस्त 1855 में पकड़कर पंचकठिया नामक जगह पर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दि गई वह पेड़ आज भी पंचकठिया में स्थित है जिसे शहिद स्थल कहा जाता है जबकि कान्हू को भोगनाडीह में फांसी दे दी गई पर आज भी वह संथालो के दिलो में आज भी जिन्दा है एवं याद किए जाते है।

संथालो के इस हार पर भी अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से हिला कर रख दिया था। कार्ल मार्क्स ने इस विद्रोह को ‘भारत का प्रथम जनक्रांति’ कहा था। आज भी 30 जून को भोगनाडीह में हूल दिवस पर सरकार द्वारा विकस मेला लगाया जाता है एवं विर शहिद सिदो-कान्हू को याद किया जाता है।

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