Pabiben Rabari की प्रेरणादायक कहानी, 200 महिलाओं को दिया रोजगार

नई दिल्ली: कहते हैं कि संघर्ष के बिना मंजिल नहीं मिलती और हकीकत भी यही है, हमारी आज की प्रेरणादायक कहानी कहीं ना कहीं यह बताती है कि इंसान का पढ़ना लिखना काफी नहीं है आगे बढ़ने के लिए, अगर मन में लगन और इच्छा हो तो एक अनपढ़ इंसान भी करोड़ों का बिजनेस कर सकता है.

गुजरात के कच्छ जिले की रहने वाली पाबिबेन रबारी (Pabiben Rabari), 5 साल की थीं तब पिता का साथ छूट गया। चौथी क्लास के बाद पढ़ाई छूट गई। मां दूसरों के घरों में चौका बर्तन करती थी, खेतों में मजदूरी करती थी। परिवार में न कोई कमाने वाला था न ही कोई आमदनी का जरिया। तीन बहनों में बड़ी पाबिबेन खेलने-कूदने की उम्र में मां के साथ काम पर जाने लगीं। कभी खेतों में कुदाल चलातीं तो कभी किसी के घर झाड़ू-पोंछा। घंटों तक कुएं से पानी भरने पर दिन का एक रुपया मिलता था। मां-बेटी दिन भर काम करते-करते थक जाती थीं, लेकिन परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी पहाड़ जैसा काम लगता था।

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अब 200 महिलाओं को दिया रोजगार

ट्राइबल कम्यूनिटी से ताल्लुक रखने वालीं पाबिबेन के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा था, लेकिन उन्होंने समर्पण के बजाय संघर्ष की राह चुनी। खुद को काबिल बनाने के साथ-साथ अपने गांव की महिलाओं को कामयाब बनाने की मुहिम शुरू की। आज उनकी कला की डिमांड भारत के साथ-साथ दुनिया के 40 देशों में है। 200 से ज्यादा महिलाओं को उन्होंने रोजगार दिया है। हजारों महिलाओं को काम से जोड़ा है। खुद उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपए है।पाबिबेन ने शुरुआत में स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग की. और धीरे-धीरे उनके प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ने लगी और आज वह एक सफल बिजनेसवूमैन है

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हर काम में पति ने दिया था साथ

पाबिबेन कहती हैं कि छत्तीसगढ़ में मेरा रहना मुमकिन नहीं हो रहा था। क्योंकि हमारा कोई स्थाई ठिकाना नहीं था और मैं वैसे रहना नहीं चाहती थी। इसलिए पति को समझाने के बाद हम वापस गुजरात आ गए। यहां आकर हमने एक किराने की दुकान खोली। पति उसको संभालने लगे और मैं वहां की ट्रेडिशनल कढ़ाई बुनाई का काम करने लगी जो अपनी मां से सीखा था। यहां ससुराल जाने वाली लड़कियां अपने साथ हाथ से कढ़ाई किया हुआ बैग और कपड़े ले जाती थीं।

मैं बड़े घर की लड़कियों के लिए ये काम करने लगीं। इससे मुझे कुछ आमदनी होने लगी।कुछ महीने बाद पाबिबेन एक संस्था से जुड़ गईं। जिसके लिए वे कढ़ाई-बुनाई का काम करती थीं। बदले में उन्हें संस्थान की तरफ से मेहनताना मिलता था। पाबिबेन कहती हैं कि हमें काम के लिए पैसे तो मिलते थे लेकिन क्रेडिट नहीं मिलता था। बड़ी कंपनियां हमसे सस्ते दाम पर खरीदकर उसे अपने नाम से महंगी कीमत पर बेचती थीं। हम बस मजदूर बनकर रह जाते थे।

पाबिबेन कहती हैं कि 2016 में मैं अपने एक परिचित नीलेश प्रियदर्शी से मिलीं। वे पढ़े-लिखे और इन सब चीजों में एक्सपर्ट थे। कॉरपोरेट और रूरल दोनों ही सेक्टर में उनका लंबा अनुभव था। उनसे मैंने अपना आइडिया शेयर किया। उन्होंने हमारी काफी मदद की और हमें मार्केटिंग की जानकारी दी, संसाधन उपलब्ध कराए। कुछ महीने बाद हमने पबिबेन डॉट कॉम नाम से खुद की कंपनी रजिस्टर की और मार्केटिंग करने लगे।

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लोगों को प्रोडक्ट आए पसंद

स्थानीय महिलाएं पाबिबेन के लिए प्रोडक्ट तैयार करने का काम करती हैं। इसके बाद वे उसकी मार्केटिंग करती हैं। पाबिबेन और उनकी टीम पहले लोकल मार्केट में कारोबार करती थीं। बाद में उन्होंने अलग-अलग एग्जीबिशन में जाना शुरू कर दिया। कई शहरों में स्टॉल लगाकर मार्केटिंग करना शुरू कर दिया। इसका उन्हें बढ़िया रिस्पॉन्स मिला।
इसके बाद उन्होंने मार्केटिंग के लिए सोशल मीडिया की मदद ली। खुद की वेबसाइट बनवाई और देशभर में अपने प्रोडक्ट की डिलीवरी करने लगीं। कोरोनाकाल में अमेजन और फिल्पकार्ट पर भी उनके प्रोडक्ट उपलब्ध हो गए। अभी वे बैग, शॉल, मोबाइल कवर, पर्स सहित 50 से ज्यादा वैराइटी के प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग करती हैं। अमेरिका, जापान सहित 40 देशों में उनके प्रोडक्ट्स की डिमांड है।

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