इटली के एक असाधारण कवि लाऊरो डी बोसिस ,विमान संचालन से अंतिम यात्रा तक !

नई दिल्ली : इटली आज मूर्तिशिल्प ,वास्तु प्रतिभा और क्लासिकल परम्परा का केंद्र बना हुआ और स्थापत्य -शैली के लिहाज़ से विश्व के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन मुसोलिनी का वो इटली जहाँ फासिस्ट सत्ता का प्रकोप था,उस इटली का भी वैश्विक इतिहास में कोई कम महत्व नहीं है,वज़ह चाहे आततायी मुसोलिनी हो या लाऊरो ड बोसिस जैसा एक असाधारण क्रांतिकारी कवि। लाऊरो ड बोसिस का जन्म 1901 में हुआ था।पिता एडोल्फो डी बोसिस जो कि इटली के निवासी थे और स्वयं भी एक कवि थे।माता उनकी अमेरिकन थीं।

लाऊरो का बचपन शांति में बीता था,किशोरावस्था तक वो आदर्श की दुनिया में ही जीते रहें लेकिन वास्तविकता ने जल्दी ही उन्हें दर्पण दिखा दिया। लाऊरो की शिक्षा-दीक्षा की बात करें तो वह कोई सामान्य या आम न थी।क्या लेटिन! क्या ग्रीक! फ्रेंच और अंग्रेज़ी साहित्य में भी उनकी पकड़ मज़बूत थी।साहित्य और कला की दुनिया को छोड़ भी दिया जाए तो वो बहुत अच्छे तैराक और विख्यात खिलाड़ी थें।
लाऊरो के बारे में एक और दिलचस्प बात यह कि लाऊरो विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद रोम विश्वविद्यालय में डॉक्टर की उपाधि भी हासिल करते हैं। एक छोटे से जीवनकाल में इतना कुछ हासिल करना कोई आम बात नहीं रही होगी।मगर लाऊरो ने यह सबकुछ हासिल किया।

जनमानस में एक कवि के रूप में जाने गए

इतनी सारी उपलब्धियों के बाद भी लाऊरो की जो पहचान जनमानस में बनी थी वो कवि की ही थी। वैसे तो उन्होंने कई ग्रंथों का अनुवाद किया था,लेकिन उनकी अपनी सबसे प्रमुख रचना ‘इकारो’ जो कि एक गीति नाट्य थी,के लिए सन् 1927 में एम्सटरडम से ओलंपिक पुरुस्कार भी मिला था।
लेकिन यह बात उस कवि को अलहदा और असाधारण नहीं बनाती।अलहदा बनाती है, उसका वो विमान यंत्र! नीले आकाश में उस विमान का उड़ना,उस उड़ते विमान को रोम की जनता के द्वारा एकटक रोमांच और आश्चर्य से भरी निगाह से देखना।
कुछ पल के लिए वहाँ के लोगों की दुनिया जैसे उस विमान के इर्दगिर्द ही थम गई थी।
असल में यही पल बोसिस को असाधारण बनाती है।
दूर क्षितिज पर उस विमान यंत्र को देखकर लोग समझने की कोशिश कर रहें थें कि आखिर वो विमान यंत्र क्या चाहता है?
वो विमान यन्त्र क्षितिज के ऊपर से क्या संदेश देना चाहता है?
उस विमान का चालक पर्चियां क्यों बरसा रहा है और पर्चियों में आखिर लिखा क्या है?
इतनी जिज्ञासाओं के बीच उस विमान का गायब हो जाना और इस तरह गायब होना कि दुबारा फिर कभी उस विमान का नहीं दिखना। बस लोग इतना ही देख पाए कि वो विमान सागर की दिशा में मुड़ा था, शायद विमान उसी सागर में समा गया होगा।
बहरहाल, लाऊरो के विमान के गायब होते ही कुछ और विमान भी क्षितिज पर मँडराने लगे थें।कहा जाता है कि अगर वो विमान अपने आप सागर में नहीं डूबा था तो ज़रूर इन विमानों ने मिलकर अकेले के उस विमान को दम तोड़ने पर मज़बूर कर दिया होगा।
यह सब हमें फ़िल्मी लग लग सकता है या किसी उपन्यास का हिस्सा भर,लेकिन यह सब बिल्कुल सचमुच घटित हुआ था।

फासिस्ट आन्दोलन को लेकर गज़ब की दूरदृष्टि

अपनी किशोरावस्था में लाऊरो ड बोसिस को फासिस्ट आंदोलन प्रगति का सूचक नज़र आ रहा था।ऐसा नहीं है कि यह आंदोलन प्रगति और स्वतंत्रता का सूचक केवल लाऊरो को ही लग रहा था बल्कि इस तरह की प्रगति उस समय के और भी युवाओं को नज़र आ रही थी।लेकिन लाऊरो जल्द ही इस वहम के जाल से बाहर आ गया।जहाँ एक वर्ग इस आंदोलन के सतही प्रगति और समृद्धि से खुश था,वहीं दूसरी ओर लाऊरो की दूरदृष्टि ने सतह के नीचे का दलदल पहले ही देख लिया था।

सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘एक बूँद सहसा उछलती’ में लाऊरो के बारे में इसी संदर्भ में लिखते हैं कि “उसने पहचाना कि आततायी सत्ता का आतंक क्रमशः बढ़ता जाता है और इसे शक्ति इस बात से मिलती है कि उसकी आरंभिक अवस्था में लोग उसकी गंभीरता नहीं समझते या कि साहसपूर्वक उसका विरोध नहीं करते।सभी अत्याचारी शासक उदासीनता और शिथिलता से पनपते हैं।”

लाऊरो, फासिस्ट आंदोलन की आदर्श दुनिया के उस पार की क्रूर सच्चाई को सामने लाने के लिए अपने करीबियों के साथ एक छोटा सा संगठन बनाते हैं और अपने उद्देश्य में पूरी तल्लीनता के साथ जुट जाते हैं। उनका उद्देश्य भी कोई सामान्य उद्देश्य नहीं था बल्कि फासिस्टों को जड़ से मिटाना ही उनका उद्देश्य था। यह संगठन फासिज़्म के आगे उस समय कैसे टिक सकता था भला ! सो लाऊरो को देश छोड़कर विदेश जाना पड़ा था लेकिन अपनी भूमि पर न होते हुए भी लाऊरो उस उद्देश्य को विदेश में भी जीते रहें।

विदेश में द्वारपाल का भी काम किया

आज हम बोसिस को इतने बड़े कवि के रूप में पढ़ और जान रहे हैं लेकिन आपको जानकर शायद हैरानी भी हो कि बोसिस पेरिस में कुछ समय तक द्वारपाल का काम भी करते हैं लेकिन आस की डोर को जीते जी कभी टूटने नहीं देते।लेकिन अधिक समय तक वो विदेश में भी नहीं रह पाते क्योंकि जल्दी ही अपने 2 भाईयों की गिरफ्तारी और उनके साथ हुए दमन के समाचार ने उनको अंदर से तोड़ दिया था।शायद यहाँ उनकी हिम्मत जवाब दे गई थी, और यहीं से उनके उस विमान यात्रा की शुरुआत होती है,जिसका उनको कोई अनुभव तक नहीं होता।

कुछ करीबियों से पैसे उधार लेकर वो एक छोटा सा हवाई जहाज खरीदते हैं और विमान चलाने की शिक्षा लेकर रोम के लिए निकल जाते हैं लेकिन जिस समय बोसिस विमान पर चढ़कर रोम के लिए रवाना होते हैं,उस समय उन्हें किसी विमान को चलाने का कुल पाँच घण्टे का ही अनुभव होता है।इस तरह 3 अक्टूबर सन् 1931 को संसार को बोसिस अलविदा कह देते हैं।उन्हें शायद इस बात का अहसास था कि यह विमान यात्रा उनके जीवन की अंतिम विमान यात्रा होगी। ‘मेरी मृत्यु का इतिहास’ में बोसिस इस बात पर जोर देते हैं कि बिना बलिदान के फासिज़्म को समाप्त नहीं किया जाता।

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