मिल्खा सिंह, नेहरू और “इंडो-पाक स्पोर्ट्स मीट”

शुभनीत कौशिक

मिल्खा सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘द रेस ऑफ माई लाइफ़’ में वर्ष 1958 में टोक्यो में आयोजित एशियाई खेलों के बाद प्रधानमंत्री नेहरू से मुलाक़ात का मर्मस्पर्शी विवरण दिया है। टोक्यो में मिल्खा सिंह ने 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता था और उन्हें ‘एशिया का सर्वश्रेष्ठ एथलीट’ घोषित किया गया था। टोक्यो में स्वर्णिम उपलब्धियाँ हासिल कर मिल्खा सिंह हांगकांग होते हुए भारतीय टीम के साथ कलकत्ता पहुँचे। अगले दिन वे दिल्ली गए, जहाँ भारतीय खिलाड़ियों के सम्मान में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और सेना प्रमुख जनरल थिमैया द्वारा समारोह आयोजित हुए।

तीन मूर्ति स्थित प्रधानमंत्री निवास में आयोजित सम्मान समारोह में मिल्खा सिंह जवाहरलाल नेहरू से मिले। वे याद करते हैं कि जब उन्हें नेहरू से मिलाया गया तो नेहरू ने उन्हें तपाक से गले लगा लिया। नेहरू ने उन्हें अपने पास बैठाया और कहा ‘नौजवान, तुमने देश को गर्व का बड़ा अवसर दिया है। अगर तुमने कड़ी मेहनत जारी रखी, तो तुम यकीनन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीट बनोगे।’ जवाब में मिल्खा सिंह ने कहा ‘पंडित जी, मैंने हाल ही में दौड़ना शुरू किया है। मैंने तब तक जीतोड़ मेहनत करने की क़सम खाई है, जब तक मैं अपने मुक़ाम को हासिल न कर लूँ।’

मिल्खा का जवाब सुन बहुत खुश हुए थे नेहरू

मिल्खा सिंह का जवाब सुनकर नेहरू बहुत खुश हुए और मिल्खा से उनके जीवन के बारे में जानना चाहा। तब मिल्खा सिंह ने उन्हें अपने त्रासद अतीत और बँटवारे के दौरान परिवार को खोने की तल्ख़ सच्चाई से अवगत कराया। मिल्खा याद करते हैं कि यह सुनकर नेहरू ने भरभराई हुई आवाज़ में उनसे कहा कि ‘मैं अतीत को बदल तो नहीं सकता और न ही मरे हुए लोगों को वापस ला सकता हूँ, लेकिन मेरे बच्चे इतना याद रखना कि तुम अनाथ नहीं हो। मैं और मेरी उम्र के हिंदुस्तानी तुम्हारे माँ-बाप हैं। अगर तुम्हें किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो तुम मेरे पास आना।’
उसके अगले ही रोज़ रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन ने यह घोषणा की कि एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले सैनिकों को जूनियर कमीशंड ऑफ़िसर बनाया जाएगा। दो दिन बाद जनरल थिमैया ने मिल्खा सिंह और उनके दूसरे साथियों को जेसीओ बनाने की औपचारिकता पूरी की।

इसी तरह मिल्खा सिंह बताते हैं कि कार्डिफ़ राष्ट्रमंडल खेलों में उनकी शानदार कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित उनसे आकर मिलीं और उनसे पूछा कि नेहरू जानना चाहते हैं कि मिल्खा को पुरस्कार में क्या चाहिए? मिल्खा का जवाब था कि वे चाहते हैं कि जब वे भारत पहुँचें तो एक दिन का राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाए। और नेहरू ने सचमुच मिल्खा सिंह की ख्वाहिश को पूरा करते हुए राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया।

‘इंडो-पाक स्पोर्ट्स मीट में मिल्खा सिंह

वर्ष 1960 में पाकिस्तान में ‘इंडो-पाक स्पोर्ट्स मीट आयोजित होनी थी। इसके लिए मिल्खा सिंह को भी बुलावा आया। पर वे बँटवारे की त्रासद यादों के ताज़ा हो जाने के डर से पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। यह जानकर नेहरू ने उन्हें बुलाया और कहा कि इस स्पोर्ट्स मीट में भाग लेना गौरव की बात है और आप वहाँ भारत के दूत के रूप में जा रहे हैं। अंततः मिल्खा सिंह राज़ी हुए और वहाँ उन्होंने अपने पाकिस्तानी प्रतिद्वंद्वी अब्दुल खालिक को 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में पीछे छोड़ा। इसी दौरान उन्हें ‘फ़्लाइंग सिख’ की उपाधि मिली।

फेसबुक पेज से साभार …

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