न चूल्हे के धुएं की दिक्क्त, न गैस सिलिंडर का खर्चा,भतेरी देवी का बायोगैस प्लांट

नई दिल्ली: एक किसान परिवार से संबंध रखने वाली भतेरी देवी (Bhateri Devi) के घर में बायोगैस प्लांट लगा हुआ है, जो सीधा उनके रसोई घर से जुड़ा हुआ है। उन्होंने यह भी बताया, कि मैंने गांव-घर में महिलाओं को हमेशा ही चूल्हे पर काम होते हुए देखा था। मैं भी पहले चूल्हे पर ही काम करती थी। इसमें परेशानी काफी होती थी। वहीं दूसरी और गैस सिलिंडर को लेकर मन में कई तरह का भय में बना रहता था। एक तो खर्च ज्यादा तो दूसरी ओर यह भी डर बना रहता था कि अगर कभी गैस खुली रह गयी और आग लग गयी तो?”

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लेकिन आज भतेरी देवी के घर की स्थिति साफ अलग है। उनकी रसोई के सभी काम गैस पर ही होते हैं और उन्हें गैस सिलिंडर के लिए कहीं नहीं भागना पड़ता है। क्योंकि बायोगैस प्लांट से उन्हें सीधी सप्लाई मिलती है। उन्होंने बताया कि पिछले 10 वर्षों से वह बायोगैस का ही इस्तेमाल कर रही हैं। इसके रहते हुए उन्हें न तो चूल्हे पर धुएं में खाना बनाना पड़ता है और न ही अब तक उन्हें गैस सिलिंडर लेने की जरूरत पड़ी है।

सालों पहले जिले में पूसा संस्थान, दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. जेपीएस डबास ने बायोगैस प्लांट लगवाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था। डॉ. डबास ने बताया, कि हमने जब प्रोजेक्ट शुरू किया तो लोगों को बायोगैस प्लांट पर ज्यादा भरोसा नहीं था। ऐसे में, हमने पीपली गांव के कुछ किसानों को जागरूक किया कि कैसे वे बायोगैस प्लांट से न सिर्फ घर में गैस की बल्कि खेतों के लिए अच्छी खाद की समस्या को भी हल कर सकते हैं।”

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डॉ. डबास की बातों से प्रभावित होकर गांव में सबसे पहले दो बायोगैस प्लांट लगे। जिनमें से एक भतेरी देवी के परिवार ने बनवाया। उनके परिवार के एक सदस्य जय सिंह बताते हैं, ‘हम दो भाई हैं और आज दोनों घरों में बायोगैस प्लांट लगे हुए हैं। एक प्लांट तीन घनमीटर की क्षमता का है तो दूसरा चार घनमीटर की क्षमता का हमारे घर में 10 मवेशी हैं और इनके गोबर से ये दोनों प्लांट चलते
शुरुआत में बहुत से लोगों ने उन्हें मना किया कि बायोगैस प्लांट का कोई फायदा नहीं होता है। लेकिन भतेरी देवी के परिवार ने वैज्ञानिकों की बात पर भरोसा करके बायोगैस प्लांट लगवा लिए।

इसके बाद से उनकी ज़िंदगी बिल्कुल बदल गयी। भतेरी देवी कहती हैं कि पिछले 10 सालों में उन्हें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई है। चूल्हे पर खाना अब तभी बनता है, जब बच्चे चूल्हे पर सिकी रोटियां खाने की इच्छा जताते हैं। अन्यथा सभी काम बायोगैस से ही हो रहे हैं।

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