विचार: किसान आंदोलन, सहजानंद सरस्वती और बलिया

लेखक: शुभनीत कौशिक

नई दिल्ली: वर्ष 1937-38 के दौरान जब उत्तर भारत के किसानों को संगठित करने के लिए सहजानंद सरस्वती युक्त प्रांत (यू.पी.) और बिहार का तूफ़ानी दौरा कर रहे थे। उसी दौरान वे बलिया के क्रांतिकारी नेता विश्वनाथ प्रसाद मर्दाना के बुलावे पर बलिया आए। यू.पी. में सहजानंद सरस्वती के दौरों का प्रबंध हर्षदेव मालवीय देख रहे थे। अपनी पुस्तक ‘किसान सभा के संस्मरण’ में सहजानंद जी ने बलिया की उस यात्रा का विस्तार से उल्लेख किया है।

वर्ष 1938 की बरसात बीतने के बाद वे संभवतः आश्विन या कार्तिक के महीने में बलिया आए। मर्दाना जी ने एक ही दिन बलिया के चार स्थानों पर किसानों की सभा आयोजित की। ये जगहें थीं – रेवती, सहतवार, मनियर और बाँसडीह। आख़िरी सभा को संबोधित कर सहजानंद जी को अगले दिन बेल्थरा रोड स्टेशन से बस्ती के लिए गाड़ी पकड़नी थी।

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बलिया में सहजानंद जी की पहली सभा रेवती स्थित एक बाग में हुई। उन्होंने लिखा है कि उसी दौरान वहाँ डिप्टी साहब का ख़ेमा भी लगा था किन्तु उन्होंने सभा में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। रेवती के बाद बारी आई सहतवार की, जहाँ एक मंदिर के ऊँचे चबूतरे पर सभा आयोजित हुई। बाँसडीह की सभा में आस-पास के क्षेत्रों से किसानों की भारी भीड़ इकट्ठा हुई। जिस मकान में सहजानंद जी ठहरे थे, उसी की छत से उन्होंने किसानों को संबोधित किया।

बलिया की चौथी सभा उसी रोज़ मनियर में रात में आयोजित हुई। उस सभा का विवरण देते हुए सहजानंद जी लिखते हैं कि वहाँ सैकड़ों किसान-सेवक (वालंटियर) वर्दी पहने और हाथ में लाठी लिए चारों तरफ़ तैनात थे और भीड़ को नियंत्रण में रखे हुए थे। वे आगे यह भी जोड़ते हैं कि ‘मीटिंग का प्रबंध, बोलने आदि का तरीक़ा ये सभी बातें सराहनीय थीं। वहाँ पर हम घंटों बोलते रहे और किसानों की समस्याओं को खोल के लोगों के सामने रख दिया…

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कांग्रेस मंत्रिमंडल के युग में भी किसानों की तकलीफ़ें पहले जैसी ही रह गईं यह देख के लोगों में बहुत ही क्षोभ था। लोग अब असलियत समझने लगे थे। अब तो बातों से नहीं, कामों से मंत्री लोगों की जाँच कर रहे थे और साफ़ देख रहे थे कि उनकी बातें डपोरशंखी निकलीं। किसान-सभा की ज़रूरत वे लोग सब समझने लगे थे।’

आख़िरी सभा ख़त्म होते-होते रात के दस-ग्यारह बज चुके थे और अब सहजानंद जी को बेल्थरा रोड के लिए रवाना होना था। रात ही में वे अन्य साथियों के साथ मोटर से रवाना हुए। उस वर्ष घाघरा में आई बाढ़ ने बलिया में भारी तबाही मचाई थी और सड़कें भी ख़स्ताहाल थीं। ख़राब सड़क के चलते सहजानंद जी की गाड़ी रास्ता भटक कर दूसरे रास्ते पर चल पड़ी।

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इसी रास्ते पर आगे जब उनकी मोटर एक कुएँ में गिरते-गिरते बची, तब उन लोगों ने रुकने का निर्णय लिया। इसी बीच गला ख़राब होने और बुख़ार की वजह से सहजानंद जी की आवाज़ भी बंद हो गई। आख़िरकार उन्होंने बस्ती के लोगों को तार भेजकर वहाँ की सभा की स्थगित करने का निर्णय लिया।

बलिया की इस यात्रा से डेढ़ दशक पहले जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा नवम्बर 1921 में प्रिंस ऑफ़ वेल्स की भारत यात्रा के बहिष्कार का निर्णय लिया गया। तब सहजानंद सरस्वती ने ददरी मेले में दुकानों को बंद रखकर प्रिंस ऑफ़ वेल्स के बहिष्कार का नेतृत्व किया था। यह बहिष्कार इतना प्रभावी था कि अधिकारियों की लाख कोशिशों के बावजूद दुकानदारों ने उस दिन दुकान नहीं खोली।

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