‘बिहार के प्रेमचंद’ और यशस्वी कथाकार : अनूपलाल मण्डल

लेखक: शुभनीत कौशिक

पटना: यह वर्ष हिंदी और अंगिका के अप्रतिम रचनाकार अनूपलाल मण्डल की 125वीं जयंती का वर्ष है। अनूपलाल मण्डल (1896-1982) जिन्हें कभी ‘बिहार का प्रेमचंद’ कहा गया। अपनी रचनात्मक प्रतिभा और वैविध्यपूर्ण जीवनानुभवों से उन्होंने साहित्य-जगत में न केवल अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, बल्कि वे फणीश्वरनाथ रेणु जैसे परवर्ती लेखकों के लिए प्रेरणास्रोत भी रहे। पूर्णिया (अब कटिहार) के समेली गाँव में जन्मे अनूपलाल मण्डल ने अपने जीवन में अध्यापक, लेखक, प्रकाशक जैसी तमाम भूमिकाएँ अदा कीं।

लेखनी

मानवीय संवेदना से परिपूर्ण उपन्यासों के लिए चर्चित रहे अनूपलाल मण्डल की पहली कृति ‘निर्वासिता’ इलाहाबाद के चाँद प्रेस से 1929 में प्रकाशित हुई। ‘निर्वासिता’ से अनूपलाल मण्डल की जो समृद्ध रचना-यात्रा शुरू हुई, उसकी साक्षी देती हैं ‘समाज की वेदी पर’, ज्योतिर्मयी, साक़ी, रूपरेखा, वे अभागे जैसी अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ। वर्ष 1937 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘मीमांसा’ प्रसिद्ध अभिनेता और फ़िल्म-निर्माता किशोर साहू को इतना पसंद आया कि उन्होंने इस उपन्यास पर ‘बहूरानी’ नाम से एक फ़िल्म भी बनाई। इतना ही नहीं उन्होंने अनूपलाल मण्डल को फ़िल्म-पटकथाएँ लिखने के लिए बम्बई आने का आमंत्रण दिया, जिसे अनूपलाल जी ने अस्वीकार कर दिया।

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मण्डल जी के औपन्यासिक संसार पर टिप्पणी करते हुए खगेंद्र ठाकुर लिखते हैं कि ‘मण्डल जी के लेखन का जो पारिवारिक दायरा है, वह परिवार की सीमा को तोड़कर सामाजिक दायरे की व्यापकता से मिल जाता है। जिससे स्पष्ट होता है कि मण्डल जी लेखकीय चिंता गहरे तौर पर मानवीय है। वे परिवार से समाज तक में मनुष्य के आपसी सम्बन्धों को मानवीय बनाना चाहते हैं। इसलिए मानवीय सम्बन्धों एवं मूल्यों के आश्रय-स्थल एवं संदर्भों की खोज करते हैं।’

स्कूलों में अध्यापन

बतौर शिक्षक अनूपलाल मण्डल ने फ़ारबिसगंज, कटिहार, आरा, छपरा, पटना से लेकर बीकानेर तक के तमाम स्कूलों में अध्यापन किया। शिवपूजन सहाय के एक लेख से प्रभावित होकर उन्होंने प्रकाशन कार्य भी शुरू किया और भागलपुर में युगांतर साहित्य मंदिर की स्थापना की। जहाँ से उनके उपन्यास तो छपे ही साथ ही लक्ष्मीनारायण सुधांशु जैसे लेखकों की कृतियाँ भी प्रकाशित हुईं।

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पुस्तकों के विक्रय से जुड़े उनके जीवन-प्रसंग भी दिलचस्प हैं। वे अपने प्रकाशन की पुस्तकें बैलगाड़ियों पर लादकर बिहार के गाँव-गाँव घूमते, गाँव और क़स्बों के लोगों के सामने अपनी रचनाओं का पाठ करते और इस तरह किताबें बेचते। समाज-कार्य में भी वे बराबर सक्रिय रहे। 1930 में ही उन्होंने अपने गाँव समेली में ‘सेवा आश्रम’ की स्थापना की। बाद में उन्हीं के प्रयासों से समेली में स्वास्थ्य केंद्र की भी स्थापना हुई।

श्री अरविंद और रमण महर्षि से गहरे प्रभावित अनूपलाल मण्डल ने हिंदी में इन दोनों विभूतियों की जीवनियाँ लिखीं। पांडिचेरी स्थित अरविंद आश्रम में रहकर उन्होंने श्री अरविंद के जीवन और दर्शन का गहन अध्ययन किया। पांडिचेरी से बिहार वापस लौटने के बाद वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के प्रकाशनाधिकारी नियुक्त हुए और आचार्य शिवपूजन सहाय के साथ मिलकर उन्होंने परिषद को उसका गौरव दिलाने का महती कार्य किया। वर्ष 1982 में उनका निधन हुआ।

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निधन से तीन साल पहले जीवन के अंतिम चरण में अनूपलाल मण्डल ने अपनी आत्मकथा ‘और कितनी दूर मंज़िल’ भी पूरी की। यह दुःख की बात है कि उनकी आत्मकथा अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी है। इसके जो अंश मैं परिषद पत्रिका में पढ़ पाया, वे बेहद दिलचस्प हैं। अनूपलाल मण्डल की आत्मकथा को प्रकाशित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। उन्हें नमन!

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