‘आचार्य नरेन्द्रदेव ग्रंथावली’ का विमोचन कार्यक्रम

नई दिल्ली: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि “जिस प्रकार सागर की गहराई नहीं नापी जा सकती है, उसी प्रकार आचार्य नरेन्द्रदेव की विद्वता को नहीं मापा जा सकता है। उन्होंने भारतीय राजनीति में नैतिकता का वह आदर्श स्थापित कर दिया, जो अतुलनीय है।”
हरिवंश ‘आचार्य नरेन्द्रदेव ग्रंथावली’ के विमोचन कार्यक्रम में राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सभागार में अपनी बात रख रहे थे। उन्होंने कहा कि ग्रंथावली का पहला तीन भाग ‘अभिधर्म कोश’ से संबंधित है। आचार्य जी कितनी भाषाएं जानते थे! अभिधर्म कोश इसकी एक बानगी है। इसका अनुवाद उन्होंने फ्रेंच भाषा से किया है।
हरिवंश ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव बौद्ध धर्म से प्रभावित थे और ग्रंथावली का चौथा खंड बौद्ध धर्म-दर्शन को समेटे हुये है। जबकि पांचवां खंड राष्ट्रीयता और समाजवाद से संबंधित है, जिसमें वे भाषा-संस्कृति और समाजवाद पर विचार प्रकट करते हैं। वहीं छठा खंड 81 भाषणों का संकलन है।
इसी क्रम में श्री हरिवंश ने सातवें एवं आठवें भाग का भी जिक्र किया और सवालिया लहजे में कहा कि जिस व्यक्ति का आचरण, व्यवहार, विचार और नीति शुचितापूर्ण रही है, आखिर उसे समाज क्यों नहीं अपना पाता है! आचार्यजी ने कुलपति रहते हुये संस्थान का विकास न होने का आरोप लगने पर त्याग-पत्र दिया था।
श्री हरिवंश ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव की साहित्य में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने साहित्यकारों के नव-संस्कृति संघ की स्थापना की थी।
कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत कर रहे पूर्व सांसद एवं समाजवादी चिंतक श्री केसी. त्यागी ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव के दिखाये रास्ते पर मैं गर्व से चलता हूं। आचार्य नरेन्द्रदेव के विचारों का ही प्रभाव था कि चंपारण सत्याग्रह के बाद कांग्रेस का किसानों और गरीबों के प्रति अधिक झुकाव हुआ।
श्री त्यागी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के भीतर कांग्रेसी और समाजवादियों के बीच संघर्ष शुरू होने पर सभी समाजवादी गांधीजी के अधिक नजदीक आ गये थे। उस दौरान आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपने विचारों से तरुण समाजवादियों को एकजुट करने का काम किया। आगे उन्होंने कहा कि यदि आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपनी कलम से मजबूत वैचारिक जमीन तैयार न की होती तो राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण भी नहीं होते।
श्री त्यागी ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव की विद्वता की कोई तुलना नहीं है। उन्होंने पंडित नेहरू को Discovery of india लिखने में बौद्धिक मदद की थी।
इस अवसर पर समाजवादी चिंतक डॉ. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव ग्रंथावली आने में बहुत देर हो गई है। तमाम समाजवादी सरकारों ने आचार्य नरेन्द्रदेव के विषय में नहीं सोचा। आचार्य नरेन्द्रदेव का समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है।
आगे उन्होंने कहा कि इस ग्रंथावली में नरेन्द्रदेव की तमाम स्थापनाओं को स्पष्ट किया गया है। उन जैसा गहरे चिंतन वाला समाजवादी व्यक्ति दूसरा नहीं हुआ। निश्चित रूप से यह ग्रंथावली समाजवाद को समझने और समझाने की राह में बहुत कारगर है।
ग्रंथावली के संपादक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा, “भारत में समाजवाद के सिद्धांतकार के रूप में एक आचार्यजी ही दिखते हैं, जो अपने विचारों, सिद्धांतों पर अटल रहते हैं। कभी समझौता नहीं करते।” आगे उन्होंने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव का पूरा रचना-कर्म केवल साहित्य से जुड़ा नहीं है, बल्कि पुरातत्व, दर्शन, धर्म, साहित्य आदि पर भी आचार्यजी ने अपना विचार प्रकट किया। आचार्य नरेन्द्रदेव केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, बल्कि शिक्षाविद् भी थे।
आचार्य नरेन्द्रदेव ग्रंथावली के पांचवें खंड का जिक्र करते हुये कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने कहा कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता को लेकर पंडित नेहरू और आचार्य नरेन्द्रदेव दो छोर पर खड़े थे। पंडित नेहरू ने राष्ट्रमंडल की सदस्यता गिड़गिड़ाकर ली। इसके लिये उन्होंने बहुत तैयारियां की थी। लेकिन, नरेन्द्रदेव ने अलग राह चुनी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वीकारने का मतलब होगा कि ब्रिटिश उपनिवेशिकता की अधीनता को स्वीकार करना।
आगे श्री राय ने कहा कि राष्ट्रमंडल की सदस्यता को लेकर पंडित नेहरू और आचार्य नरेन्द्रदेव के बीच उन दिनों जो बहस छिड़ी थी, उसका संकलन ग्रंथावली के पांचवें खंड में है। हर किसी के लिये वह प्रसंग पढ़ने योग्य है। आगे उन्होंने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव के असामयिक निधन के बाद तमाम लोगों ने जो बातें कहीं, उसका संकलन कर इस ग्रंथावली का नौवां खंड आना चाहिये। इसी संदर्भ में श्री राय ने कहा कि नरेन्द्रदेव के निधन के बाद पंडित नेहरू ने लोकसभा में उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। अच्युत पटवर्धन ने श्रद्धांजलि देते हुये एक कविता कही थी- ‘कल तक कहते थे कि बिस्तर से उठने की ताकत नहीं, आज दुनिया छोड़कर चले गये।’
इसी दौरान रहस्य उद्घाटित करते हुये श्री राय ने कहा कि आचार्य नरेन्द्रदेव बड़े विनोदप्रिय थे। विनोदप्रियता उनकी बड़ी ताकत थी।
कार्यक्रम में आचार्य नरेन्द्रदेव की पौत्रवधु मीरा वर्धन ने भी अपनी बातें साझा कीं। उन्होंने कहा कि आचार्यजी का परिवार आपसब के लिये कृतज्ञ है कि उन्हें स्मरण किया जा रहा है। हमारे लिये आज भी वे जीवित हैं और परिवार उनके बताये रास्ते पर चल रहा है।
प्रारंभ में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कलानिधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अतिथियों का स्वागत कर उनका परिचय कराया। जबकि आखिर में आचार्य नरेन्द्रदेव ग्रंथावली के प्रकाशक के.एल.पचौरी की ओर से तरुण विजय पचौरी ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और के.एल.पचौरी प्रकाशन के तत्वावधान में किया गया था।

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