सदी का कालजयी उपन्यास ‘द नियोजित शिक्षक’

गाँव में रहता हूँ, शहरों से दूर !
दोपहर का वक़्त था, छत पर बैठकर हिंदी उपन्यास ‘द नियोजित शिक्षक’ का आनंद ले रहा था कि तभी बगल के दुकान में किसी व्यक्ति को गाते सुना कितना मनमोहक गा रहा था कि मन किया उपन्यास छोड़ गायक को सुनता रहूँ………

किन्तु फिर उपन्यास पढ़ने में डूब गया और सोचने लगा कि एक तरफ उपन्यास में नायक का प्रतिभा भी भ्रष्ट सिस्टम के फेर में दब रहा है और दूजे तरफ देश में अच्छे-अच्छे ग्रामीण प्रतिभायें भी दम तोड़ रही हैं।

अरे, मैं भी कहाँ आ गया ?

शाम तक मैंने उपन्यास पढ़ लिया। शिक्षकों की ज़िंदगानी लिए उपन्यास, शिक्षकों की कहानी न होकर, हमारी-आपकी यानी हमसभी की कहानी अब लगने लगी है। यह उपन्यास भारत के हरेक शिक्षकों की कहानी हैं, जिन्हें दो वक़्त की रोटी के लिए मासिक सैलरी भी समय पर नहीं मिल पाती हैं, ऐसे में शिक्षक अपना गुजाराभत्ता कैसे कर पायेंगे ?

वैसे उपन्यास के नायक असाधरण गुणों से भरपूर हैं, लेकिन सामाजिक विडम्बनाओं में वे ऐसे फँसते हैं कि upsc में उत्तीर्ण बंदा ‘नियोजित शिक्षक’ बनने पर मजबूर हो जाता है।

उपन्यास में इस लाइन को पढ़ते-पढ़ते मैं रुक सा गया-

“क्या आदर्श विद्यालय में सिर्फ आदर्श शिक्षक होंगे, अधिकारीगण, अभिभावक और विद्यार्थी कभी आदर्श नहीं बनेंगे ? क्या आदर्श परीक्षा केंद्र बना देनेभर से परीक्षार्थी आदर्श ही मिलेंगे ?”

कितना सटीक वर्णन किया है लेखक ने ! कुल मिलाकर यह उपन्यास भारत के शिक्षकों की वैसी गाथा है, जिसे आजतक किसी ने नहीं सुना। हाँ, इस उपन्यास को इस सदी का ‘कालजयी’ उपन्यास कह सकते हैं।

अर्जुन सिंह, झारखंड.

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