आधुनिकता और परंपरा के बीच एक महिला की कहानी: पंचपन खम्भे लाल दीवारें

नई दिल्ली: पंचपन खम्भे लाल दीवारें उषा प्रियंवदा का प्रथम उपन्यास है।उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत ही नहीं हुआ कि यह किसी का प्रथम उपन्यास हो सकता है क्योंकि उषा प्रियंवदा ने आधुनिकता और पुरातन का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है।इस उपन्यास की मुख्य भूमिका में 33 वर्षीय सुषमा है,जोकि संवेदनशील और सुशिक्षित महिला है।पेशे से सुषमा एक कॉलेज में इतिहास विभाग में प्रोफेसर है।कार्य के प्रति लगन और ईमानदारी से उस कॉलेज की प्रिंसिपल सुषमा से काफ़ी प्रभावित होती हैं और यक़ीन तो इतना कि कॉलेज के होस्टल में वार्डन का पद भी सुषमा को दे देती हैं।यह सब सुषमा ने काम के प्रति निष्ठा और व पानी के समान व्यवहार के कारण अर्जित किया था,जो सभी से मृदु व्यवहार रखती है।

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सुषमा का संबंध एक मध्यमवर्ग परिवार से है,जहाँ पिता रिटायर हो चुके हैं और सारा घर सुषमा की नौकरी से ही चलता है। वैसे सुषमा का व्यक्तित्व कम आकर्षक नहीं है,उससे जो कोई भी मिलता वो उसे उसके असल उम्र से बहुत कम का ही आँकता है और सुषमा का आभा भी ऐसा है कि कोई उसके आभा के तेज़ से बच ही नहीं पाता है।कुछ ऐसा ही हाल नील के साथ होता है। नील सुषमा के जीवन का वो अध्याय है,जिसे न तो वो पूरी तरह सहेज ही पाती है न पूरी तरह फाड़ ही पाती है।सुषमा नील से खूब प्रेम करती है।ऐसा भी नहीं था कि यह प्रेम केवल एकतरफा है,बल्कि नील भी सुषमा को खूब चाहता है।

जब वह फार्म के काम से हॉलैंड जाने लगता है तो सुषमा से विवाह कर उसे साथ ले जाने की बात करता है लेकिन यह सब जितना सरल लग रहा है उतना असल में है नहीं क्योंकि सुषमा का जीवन सबकुछ तय होते हुए भी काफ़ी उलझा हुआ है।सुषमा परिवार और छोटे भाई-बहनों के सपनों के आगे अपने सपनों को कोई एहमियत नहीं देती है।ऐसा लग रहा है कि उनकी जिम्मेदारी और सपने पूरे करना ही सुषमा के जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।

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सुषमा की इच्छा होती है कि वो विवाह करे और अपना घर बसाए लेकिन भाई-बहन के भविष्य को सोचते हुए वो हर -बार उस ख्याल को बड़े ही बेरहमी से कत्ल कर देती है। सुषमा को बार-बार उसके आसपास मित्र व संबंधी समझाते हैं कि वो कुछ अपने बारे में भी सोचे भाई-बहन एक समय के बाद अपनी दुनिया में मस्त होते ही सुषमा को भूल जाएंगे लेकिन इस बात को एक कान से सुनती और दूसरे से निकाल देती।वो इस बात को बेहतर जानती है कि अगर वो विवाह करके अपना घर बसा लेती है तो इन भाई -बहनों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?आखिर पिता के पेंशन से घर चल भी कहाँ पाता है।

सुषमा जब कभी बहुत अकेले पड़ने पर अपने जीवन के आज और बीते कल के साथ आने वाले कल को देखती तो और भी ज्यादा ऊब और घुटन महसूस करती वो सोचती कि आखिर एक उम्र पर उसकी शादी भी क्यों नहीं कर दी गयी,यह ख्याल आते ही सुषमा को अपनी माँ पर गुस्सा आता क्योंकि विवाह न होने का सारा दोष सुषमा पर मढ दिया जाता।जब भी सुषमा के विवाह की बात आती वो चीजों को इस तरह रखतीं कि जैसे सुषमा खुद ही न चाहती हो कि उसका विवाह हो किन्तु सच क्या है?यह बात सुषमा और उसकी माँ बेहतर जानती है और ऐसी किसी स्थिति आने पर दोनों ही एक-दूसरे से नज़रें झेंप लेते हैं।

इस पूरे उपन्यास में सुषमा के जीवन में अकेलेपन और उसके जीवन में आए प्रेम त्रासदी का ही वर्णन मिलता है। वो नील के साथ साथ जाना तो चाहती है लेकिन घर की जिम्मेदारी उसका रास्ता रोक लेती हैं।सुषमा आज़ाद होकर भी सामाजिक रीति-रिवाजों में बंधी स्त्री है। एक अच्छी नौकरी ,सम्मान और परिवार के होते हुए भी सुषमा जिस तरह मानसिक स्तर पर अकेलेपन से गुजरती है वो सच में किसी त्रासदी से कम नहीं है।

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प्रेम को बहुत करीब से खो देना यह सुषमा के जीवन में नारायण के बाद दूसरी बार हुआ था जब नील के साथ संबंध- विच्छेद होता है।सुषमा के पूरे जीवनकाल को मीनाक्षी के द्वारा विवाह को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में ही समाहित है जब सुषमा कहती है कि-“आज से सोलह साल बाद शायद तुम अपनी बेटी को लेकर इस कॉलेज में आओ,तब भी तुम मुझे यहीं पाओगी।कॉलेज के पचपन खंभों की तरह स्थिर,अचल…”

सुषमा एक संवेदनशील और दूसरों के दुःखों को अपना दुःख समझने वाली महिला है लेकिन बदले में उसके हिस्से कुछ आया तो वह थी ट्रेजेडी।सचमुच सुषमा के जीवन की नियति ही यही है कि उसे वही सब करना और जीना है जो वो करना और जीना ही नहीं चाहती। अकेलापन किस हद इंसान को मानसिक यंत्रणा दे सकता है यह सुषमा के जीवन से समझा जा सकता है।शायद सुषमा की नियति को देखते हुए ही उपन्यास का अंत नील से विच्छेद और उन पचपन खंभों लाल दीवारों में समाप्त हो गया जहाँ से यह उपन्यास शुरू होता है। यूँ तो यह उपन्यास 1962 का है लेकिन आज भी बहुत से हिस्से बहुत हद तक प्रासंगिक है।

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