एक स्वतंत्र ऑलओवर रेगुलेटरी बॉडी होनी चाहिए-कमर वहीद नकवी

बीते रविवार 12 दिसंबर को गांधी जी के पाठशाला में वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नक़वी एक शिक्षक के रूप में मौजूद रहे। उन्होंने ‘‘मौजूदा पत्रकारिताः चुनौतियां और अवसर’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। पाठशाला की शुरुआत दिल्ली स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की प्रथम वर्षीय छात्रा हिना पैगाम ने वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नक़वी जी के परिचय से की।

कमर वहीद नक़वी ने अपने संबोधन में बताया कि ‘‘मौजूदा पत्रकारिता के चुनौतियों और अवसर’’ यह विषय एक यूनिवर्सल विषय है, मनुष्य जाति और सभ्यता का विकास ही चुनौतियों के कारण हुआ। हामरे पास आज ऐसी सुविधाएं हैं जो पहले नहीं थी। इन्टरनेट के जरिए आज हम ऑनलाइन बात कर रहें हैं।
मीडिया के सामने दो चुनौतियां होती हैं एक मूल्यों की चुनौती दूसरा टैक्नॉलाजी की चुनौती। मीडिया का पतन हो रहा है या वह गर्त में जा रहा है। उसकी उन्नती हो रही है या पतन यह एक सवाल है। टैक्नॉलाजी ने आपके जीवन को कैसे बदला। आज से 66 से 70 हजार वर्ष पहले मानव की सात प्राजातियां थी। जिनमें से होमो सेपियन्स नामक एक मात्र प्रजाति ही जीवित रही। मनुष्य ने अपने जीवन को सुधारने के एलिए अनेक चुनौतियों का सामना किया।
मनुष्यों के इतिहास को अच्छे से समझने के लिए उन्होंने यूवाल नोवा हरारे की प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘होमो सेपियंस’’ का भी जिक्र किया। कमर जी ने कहा कि चुनौतियों ने हमेशा समाज में एक व्यवस्था कायम की है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के विकास की शुरुआत खेती सीखने से हुई और विज्ञान के क्षेत्र में जिस प्रकार पहिया मानव की सबसे बड़ी खोज है उसी प्रकार प्रिंटिंग प्रेस भी महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।
खेती से मनुष्य की सभ्यता का टर्निंग प्वाइंट शुरू होता है, खेत की सुरक्षा से सम्पति की सुरक्षा का विचार पनपा, उस समय जमीन सम्पति नहीं होती थी, खेती के बाद जमीन पर स्वामित्व शुरू हुआ, धीरे-धीरे नयी चीजें जुड़ती गयी, एरिया बढ़ता गया, तो उस डेटा को कैसे रखे ? रस्सीयों में गांठे बांध कर डेटा सुरक्षित रखने की शुरूआत हुई। इस प्रकार एक समाज व्यवस्था बनी फिर स्क्रिप्ट की खोज हुई। प्रिंटिग प्रेस के साथ ही मनुष्य के विकास यात्रा में छलांग लगती है।
टैक्नॉलाजी ने जीवन बदला, भाषा बदली, टैक्नॉलाजी भाषा के साथ कन्टेन्ट भी बदलती है, रेडियो टीवी और समाचारपत्रों की भाषा अलग होती है।
पहले विद्वान किताब लिख कर अपने घर पर रखते थे, ज्ञान उस वक्त सीमित था। आम आदमी ज्ञान से वंचित थे। प्रिंटिंग प्रेस ने एक्सेसिबिलिटी बढ़ा दी लिखा हुआ छापा, वितरित हुआ, जनता तक पहुंचने लगा। लिटरेसी और इंफॉर्मेशन बढी। एक समूह का दूसरे समूह से इंटरेक्शन बढा। संसार के बड़े आविष्कारों में पहिए का बड़ा योगदान है। आज मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से सूचनाएं आप अपनी टिप्स पर प्राप्त कर रहे हैं। पहले हमें लाइब्रेरी जाना पड़ता था। टेक्नोलॉजी ने जीवन बदला, भाषा बदली और साथ ही टेक्नोलॉजी ने कंटेंट भी बदला । प्रिंटिंग प्रेस में पहले हैंड कंपोजिंग होती थी, अब ऑफसेट प्रिंटर्स और कंप्यूटर आ गए। रेडियो और टीवी का कंटेंट बिल्कुल अलग है। कम्युनिकेशन का सिद्धांत के अनुसार संचार माध्यमों की भाषा, शब्दों का चुनाव, आपके साथ पाठक या श्रोता का रिलेशन क्या है उस पर निर्भर करता है। आपस में आपका क्या रिश्ता है, इस पर कम्युनिकेशन की भाषा कंटेंट निर्भर करता है। आपकी इंटिमेसी पाठक के साथ नहीं है तो आपकी भाषा फॉर्मल होती है लिखने और पढ़ने वाले के बीच यदि फिजिकल कनेक्ट नहीं है तो बिना इमेज के आप चीजों को समझ नहीं सकते। फिजिकल कनेक्ट कम्युनिकेशन के लिए बेहद जरूरी है। रेडियो में फिजिकल कनेक्ट आवाज और स्पीच से बनता है। टीवी में बोलने वाला व्यक्ति अपने सामने दिखता है, आप उसे साक्षात अनुभव कर सकते हैं। टीवी का कम्युनिकेशन ज्यादा इंटिमेट और इनफॉर्मल होता है। भाषा ज्यादा इनफॉर्मल होती है।
टेक्नोलॉजी और मीडियम भाषा को बदल देते हैं पहले कम्युनिकेशन वनवे होता था पत्रों के द्वारा लोगों की रिएक्शन पता चलती थी। वेबसाइट के बाद कमैंट्स और फीडबैक आने लगा सोशल मीडिया ने इसे जबरदस्त तरीके से खोल दिया। सोशल मीडिया ने दो तरफा कम्युनिकेशन को जन्म दिया, यह एक बुनियादी अंतर मीडिया में आया। पहले मीडिया एजुकेटर की भूमिका में थी। पहले दिनमान और अन्य अखबार हम पढ़ते थे, अनेक मुद्दों पर बात होती थी, राष्ट्रीय अखबार को छोटे अखबार फॉलो किया करते थे आज मीडिया की भूमिका एजुकेटर से इंटरटेनर की हो गई है। कम्युनिकेशन लोगों के रिलेशन पर निर्भर करता है।
कन्ज्यूमर कि पहले कोई भूमिका नहीं थी। कारपोरेटीकरण की शुरुआत प्रिंट से शुरू हुई, एडिटर को मार्केट से जोड़ने की शुरुआत हुई। आज मार्केट प्रिंट माध्यम पर भारी है जैसे कम्युनिकेशन वैसा प्रोडक्ट, जैसा साबुन का बाजार बदला, ऐसे ही टेक्नोलॉजी ने अपना कंटेंट चेंज कर दिया। मीडिया का बाजार में जबरदस्त दबाव है। इसका कोई समाधान नहीं है मीडिया का पॉलिटिकल कनेक्शन भी है। पहले न्यूज़ में उनकी न्यूट्रल वैल्यू होती थी फैक्स का फेयर रिप्रेजेंटेशन होता था बिना पूर्वाग्रह की खबरें होती थी। न्यूज आइटम्स के फैक्टस डिस्टेªक्ट नहीं होते थे। आज के जमाने में जर्नलिस्ट अपनी ही विचारधारा और पसंद के आधार पर न्यूज़ प्रस्तुत करता है।
हम लोगों को ऐसी मीडिया रेगुलेटरी बनानी चाहिए जो अंब्रेला टाइप हो। आजकल सेल्फ रेगुलेटरी अथॉरिटी हैं किसी एक मुद्दे पर रेगुलेटरी अथॉरिटी के विचार अलग-अलग हो सकते हैं, ओवरऑल रेगुलेटरी बॉडी हो। जिसे संवैधानिक दर्जा मिले जैसे सीबीसी को मिला है, उसे स्वतंत्रता प्राप्त हो राजनैतिक और सरकारी हस्तक्षेप से परे हो और जो प्रिंट डिजिटल दोनों तथा सोशल मीडिया सब को देखें यह सब के लिए एक गाइडलाइन बनाएगी। इन रेगुलेटरी बॉडी की सदस्यता हर प्रकाशक रखें। टेक्नोलॉजी आज एक चैलेंज है। प्रिंट, टीवी डिजिटल, मीडिया का कन्वर्जेंस हो गया है। पत्रकार को सब माध्यम में काम करना आना चाहिए। डिजिटल जनरेशन को इग्नोर नहीं कर सकते। डिजिटल में स्किल होना आवश्यक है आप अपने गांव और शहर में उसे प्रयोग कर सकते हैं सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन आना चाहिए।
सर्वप्रथम उन्होंने मीडिया के तीनों प्रमुख प्रारूपों (प्रिंट, रेडियो और टीवी) के भाषाई अंतर को स्पष्ट किया।
कमर वहीद नक़वी ने कहा कि पहले मीडिया मे फीडबैक की व्यवस्था उतनी उन्नत नही थी परन्तु आज डिजीटल जर्नलिज्म और सोशल मीडिया के उदारीकरण के कारण आम जनमानस का फीडबैक संपूर्ण आवाम तक पहुंचना काफ़ी सरल हो गया है।

उन्होंने कहा कि आज के युवा डिजीटल प्लेटफॉर्म पर अपने अच्छे कॉन्टेंट की सहायता से यूट्यूब आदि की मदद लेकर अच्छी आय भी अर्जित कर सकते हैं।
अपने संबोधन के बाद उन्होंने बहुत से सवालों के काफ़ी संतोषजनक उत्तर भी दिए। इसके पश्चात दिल्ली स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म के प्रथम वर्षीय छात्र सूजल शर्मा ने कमर वहीद नक़वी जी और गांधी जी की पाठशाला के संयोजक डॉ. सुभाष गौतम जी के धन्यवादज्ञापन के साथ कार्यक्रम की विधिवत समाप्ति की।

रंजना बिष्ट

Leave a Reply