समाज की एकता के विषय में देश और काल का विचार करते हुए चिंतन करना होगा

आदरणीय पन्त जी, आपका भावपूर्ण संदेश अभिनन्दन के योग्य है।परन्तु इसमें कई पेंच हैं। वस्तुतः जिन दिनों की बात विदेशियों ने की है या और भी लोगों ने की है देश में भी,
उन दिनों हिंदू समाज एकजुट था ।
परिपक्व हिंदू समाज अनेक स्तरों वाला, अनेक इकाइयों वाला ,अनेक स्तर विन्यास वाला है जैसे आजकल के यूरो अमेरिकी समाज कुछ कुछ कोशिश कर रहे हैं होने की। पर हो नहीं पा रहे व्यवस्थित ढंग से।
हिन्दू समाज में बहुस्तरीय आयामों का तथा बहुस्तरीय विन्यास का बहुत गहरा बोध रहा है ,जिसका आधार यहां की ज्ञान परंपरा, विद्या परंपरा और साधना परंपरा रही है।

अंग्रेजों ने उस विराट शिक्षातन्त्र को नष्ट किया और अंग्रेजों के उत्तराधिकारी कांग्रेसियों तथा अन्य सभी दलों ने उस विद्या को अतीत की चीज मान लिया है और यूरो ईसाइयों की शिक्षा को ही भारत में एकमात्र आधुनिक शिक्षा प्रचारित कर रखा है।
इसके परिणाम सामने हैं।चार चार पीढ़ियों तक इस कुशिक्षा के व्याप्त रहने के कारण वे परिणाम खुलकर सामने आ रहे हैं ।।

यदि ब्राम्हण का काम सचमुच चिंतन करना है (वैसे तो भारत में ऐसा कोई समूह नहीं है जिसमें बुद्धि पर्याप्त ना हो और चिंतन की सामर्थ्य पर्याप्त ना हो ,परंतु फिलहाल तर्क के लिए यदि ब्राम्हण का काम सचमुच चिंतन करना मान लिया जाए ) तो उसे सबसे पहले देश और काल का चिंतन करना चाहिए ।

यह जो देश भारतवर्ष है ,,इसमें यह जो वर्तमान काल है, वह धर्मविहीन, धर्मनिरपेक्ष शासकों के द्वारा शासित है और यूरो ईसाई शिक्षा में अगाध आस्था से संचालित है तथा विशेषकर हिंदू समाज को चार चार पीढ़ियों से धर्म और अध्यात्म से रहित एवं नास्तिक तथा भौतिकता वादी रहने की शिक्षा बलपूर्वक दी जा रही है । शिक्षा पर शासन प्रशासन का नियंत्रण है ।समाज से शिक्षा की शक्ति छीन ली गई है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि अनेक ईसाई मिशनरियों से प्रेरित समूहों में भीषण राजनैतिक लालसा जगी हैं। उन्होंने समाज से द्वेष भाव रखने वाले एक विचित्र प्रकार के जातिवाद का रूप धारण कर लिया है ।
क्योंकि जाति तो समाज से बाहर हो नहीं सकती ।
परंतु इन सब में समाज से द्वेष करना ,समाज से घृणा करना, हिंदू समाज की निंदा करना ,उसे नष्ट करने योग्य वस्तु प्रचारित करना तथा फिर भी अपनी जाति की पहचान को कायम रखना :-ऐसा एक विचित्र सा राजनैतिक व्यवहार किया जा रहा है और यह “वंचित और पिछड़ी जाति “नामक काल्पनिक नाम से चला रखा है। इन जातियों में समाज का कोई भी बोध नहीं है और समाज को एक रखने की कोई भी लालसा नहीं है ।।

यह उनमें किसी बुद्धि की कमी का मामला नहीं है।।
यह स्पष्ट रूप से बुद्धि द्वारा संचालित नियोजित एवं निर्देशित निर्णय है और एक राजनीतिक निर्णय है तथा इसके द्वारा विशेषकर ब्राह्मणों को अपप्रतिष्ठित कर कथित उच्च जाति कहे जाने वाले लोगों से सत्ता का न्यूनतम अंश भी छीन लेना और सत्ता पर अपने ही समूह का एकाधिकार रखना :यह स्पष्ट राजनैतिक प्रयोजन है।।
इसे नहीं समझने पर पुरानी ब्राम्हण परंपरा का तोते की तरह स्मरण करना और उनको हिंदू समाज को एक रखने की जिम्मेदारी का उपदेश देते रहना निष्फल रहेगा और यह वंचकों की राजनैतिक लालसा का ही तोषक पोषक सिध्द हुआ है, हो रहा है और होगा।
उस ब्राह्मण को समाज को एक रखने का उपदेश देना जो शासन द्वारा , राजनीति के द्वारा विभाजित है और जिस ब्राह्मण समाज के पास कोई भी वास्तविक राजनैतिक एवं बौद्धिक अधिकार अधिकृत और विधिक रुप से वर्तमान राज्यकर्ताओं ने नहीं छोड़ रखा है,जिसके कारण वह न तो समाज में पहले के जैसा सम्मानित है और ना ही उसके पास शिष्ट परिषद ,विद्या केंद्र आदि हैं और ना ही भारत में जाति पंचायतों का परंपरागत स्वरूप है जो सभी की सभी जाति पंचायतें ब्राह्मणों को ही प्रमाण मानती थी और श्रद्धा से देखती थी।।

वह सब परंपरा नष्ट कर दी गई है और एक यूरो इंडियन पंथ भारत में शासन कर रहा है जो योजना पूर्वक समाज विरोधी, समाज से द्वेष रखने वाले तथा समाज को नष्ट करने की लालसा वाले जातिवाद का पोषण कर रहा है और प्रसार कर रहा है ।।

ऐसी स्थिति में हवा में किसी समाज की एकता की कल्पना करना न केवल हास्यास्पद होगा अपितु निष्फल होगा और घोर निराशा की ओर ले जाएगा ।।

इसलिए समाज की एकता के विषय में देश और काल का विचार करते हुए चिंतन करना होगा ।।
सत्य ही एकता का आधार है ।।
ब्राह्मणों की भी एकता का कोई अर्थ तभी है जब वह कथित कतिपय जातियों के साथ हो रहे अन्याय के झूठ का तीव्र विरोध करें और उस झूठ को शासन के द्वारा मान्यता दिए जाने का अपनी बुद्धि से बहुत सोच-विचार कर व्यवस्थित रूप से विरोध करें ।।
हमारे पास इसके प्रमाण मौजूद हैं कि ऐसा कोई अन्याय इन जातियों के साथ भारतवर्ष में कभी भी नहीं हुआ।
इसलिए उस काल्पनिक अन्याय के आधार पर जो तरह तरह के कानून बन रहे हैं ,जो अनुचित पक्षपात और भेदभाव किया जा रहा है, हद से ज्यादा विधिक अधिकार दिए जा रहे हैं कि कोई भी झूठी शिकायत करके उच्च कही जा रही जाति के लोगों को गिरफ्तार करवा सकता है ,जेल में डलवा सकता है ।

इन सब भयानक स्थितियों की बारंबार समाज के सामने चर्चा करनाऔर समाज को अपनी मूल परंपरा और धर्म का स्मरण दिलाना तथा शासन को न्याय पूर्ण बनने की प्रेरणा भी देना और ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश करना कि शासन न्याय करने की ओर बढ़े,ब्राह्मणों सहित सबका कर्तव्य है।।
न्याय के नाम पर कतिपय जातियों को कल्पना से भी अधिक विधिक संरक्षण देकर उन्हें मानो जन्मजात शासकीय न्याय कर्ता बनाने वाला अधर्ममय राजनीतिक निर्णय जब तक है ,तब तक हिंदू समाज की एकता की बात करना भी हास्यास्पद है ।।

ऐसा समाज कभी एक नहीं रह सकता जिसमें शासक लोग खुलेआम भेदभाव को पोषित करते हों और न केवल पोषित करते हो ,अपितु योजना पूर्वक समाज के एक अंश को अकारण दंडित कर रहे हो और उसके साथ अन्याय कर रहे हो ।
अन्याय को चुपचाप स्वीकार करना और उसके बाद समाज की एकता की कल्पना करना ब्राह्मण के लिए भी उचित नहीं है।
प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज

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