विचार : Maitreyi Pushpa का सुधीश पचौरी पर कटाक्ष

नई दिल्ली : जब जब दो बड़े लेखक अपने विचारों को रखते है तब तब एक नया विवाद जन्म लेता है. किसी की आलोचना करना बुरा नहीं होता, लेकिन आलोचना की भी एक सीमा होती है, एक तरीका होता है. हिन्दी के हिन्दुस्तान अख़बार में सुधीश पचौरी (Sudhish Pachauri) आलोचनात्मक लेख लिखा करते हैं. पचौरी जी, कि एक आलोचनात्मक टिप्पणी पर खेद व्यक्त करते हुए लेखिका मैत्रेयी पुष्पा (Maitreyi Pushpa) लिखती हैं.

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“जब जब इतबार के दिन हिन्दी के हिन्दुस्तान अख़बार में सुधीश पचौरी का कॉलम देखती हूँ, पढ़ती भी हूँ, मुझे लगता है वे आलोचना का ज़िक्र करते हुये आलोचना का मज़ाक़ उड़ाते हैं. यों तो वे खुद भी किताबों की समीक्षा/ आलोचना करते रहे हैं लेकिन आज तो आलोचना को उन्होंने मज़ाक़ का विषय बना दिया है. यह उनके लिये कोई अजीब काम नहीं है, सम्मभवत: यह उन की आदत में शुमार है. उनकी यह आदत कुछ चुने हुये लोगों पर लागू होती है, हर एक लेखक पर नहीं होती, यह तो मैं मानती हूँ. अब भी वे समीक्षा लिखते हैं , ऐसा मेरी नज़र में नहीं आया. हो सकता है मेरे अध्ययन में कमी रही हो.”

मैत्रेयी पुष्पा

“बहरहाल मेरी पुस्तकों के ऊपर से उनकी दो ‘ समीक्षायें ‘ गुजरी हैं. एक थी ‘इदन्नमम ‘ उपन्यास पर ,शीर्षक था – अधूरी अहीर कथा (जनसत्ता) और दूसरी थी गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा) पर जिसमें उन्होंने प्रमुखता से वह गाना डाला था जो किसी फ़िल्म में विपाशा बसु पर फ़िल्माया गया था – “बिल्लो रानी कहो तो हम जान दे दें “ (हिन्दुस्तान) यह फूहड़ मज़ाक़ था या अपनी समीक्षा की सजावट ? अफ़सोस यह भी कि इस वक्त अख़बार की सम्पादक श्रीमती मृणाल पांडे थीं,”

मैत्रेयी पुष्पा

“समीक्षा का यह रूप देख कर पाठक बाग बाग हो जायेंगे ? मगर पाठकों ने इस धुरन्धर समीक्षक को क़तई नज़रअंदाज़ कर दिया. पाठकों पर मेरा भरोसा ऐसे ही नहीं बना और मैंने ऐसे ही नहीं माना कि पाठक ही पुस्तक का सबसे बड़ा समीक्षक होता है. न यक़ीन हो तो मेरी बात को आज़माकर देख लेना. “

मैत्रेयी पुष्पा

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