जनसंख्या नियंत्रण के केन्द्र में Two Child Policy क्या, क्यों और कैसे ?

लेखक- अभय कुमार

नई दिल्ली: हाल ही में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण विधेयक- 2021 (Two Child Policy) का मसौदा प्रस्तुत किया। इस विधेयक को टू चाइल्ड पॉलिसी के तौर पर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस विधेयक में जनसंख्या नियंत्रण के लिए टोटल फर्टीलिटी रेट (टी.आर.एफ.) को 2026 तक 2.1 और 2030 तक 1.9 पर लाने का लक्ष्य रखा है। इस बिल के अनुसार वहीं लोग सरकारी नौकरी के पात्र और सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकेंगे जिनके दो या दो से कम बच्चे हैं।

ये बिल उस समय पेश किया गया है जब सूबे में चुनावी सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। ऐसे में हंगामा होना लाजमी है। विपक्ष का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार जनसंख्या नियंत्रण को लेकर गंभीर होती तो ये बिल चार साल पहले लेकर आई होती। इस विधेयक को सरकार केवल चुनावी मुद्दा बनाने के लिए लायी है। ऐसे में एक नागरिक के तौर हमारे लिए इस विधेयक के विभिन्न पहलुओं को समझना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। साथ ही ये भी जानने की जरूरत है कि क्या सच में हमारे देश में जनसंख्या नियंत्रण संबंधी कानून की आवश्यकता है।

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जनसंख्या नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण विधेयक- 2021

ये विधेयक नीति राज्य विधि आयोग, उत्तर प्रदेश के चेयरमैन ए. एन. मित्तल के के द्वारा पेश किया गया। इस बिल के कानून बनने के साथ राज्य की सरकार नौकरियों के लिए केवल वो लोग ही पात्र रह जाएंगे जिनके दो या उससे कम बच्चे हैं। इसके साथ जो लोग पहले से ही सरकारी नौकरी में हैं उन्हें पद्दोन्नति से वंचित रखा जाएगा, यदि दो से अधिक बच्चे की स्थिति बनती है। इस कानून का उल्लंघन करने वालों को 77 सरकारी योजनाओं और अनुदानों जैसे- राशन कार्ड, निर्वाचन आदि से वंचित रखने का प्रावधान किया गया है।

विधेयक के अनुसार दो बच्चे पैदा करने वालों को सरकार ने अतिरिक्त लाभ देने का प्रावधान भी किया है। यदि आप सरकारी नौकरी में हैं तो सेवानिवृति के समय दो अतिरिक्त वेतन, घर/जमीन खरीदने में सब्सिडी, यूटिलिटी बिल में छूट और ई.पी.एफ. में 3% की अतिरिक्त वृद्धि दी जाएगी। और यदि आप सरकारी नौकरी में नहीं हैं लेकिन दो बच्चे तक सीमित है तो आपको मायूस होने की जरूरत नहीं है। आपके लिए बिजली/पानी के बिल और होम लोन/हाउस टैक्स पर छूट देने का प्रावधान भी किया गया है।

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अन्य राज्यों में टू चाइल्ड पालिसी की स्थिति

उत्तर प्रदेश से पहले देश के 12 राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण कानून लाये जा चुके हैं। जिनमें बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तराखंड प्रमुख राज्य हैं। मध्यप्रदेश में सिविल सर्विस रूल के तहत 26 जनवरी 2001 को यह कानून लाया गया। लेकिन दुर्भाग्य की बात ये रही कि इसके बावजूद भी 2001- 2011 के बीच मध्यप्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर 20.35% रही जो कि राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि दर से ज्यादा है। इसी प्रकार राजस्थान में भी 1996 में ऐसा ही कानून लागू किया गया लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

राजस्थान की फर्टिलिटी रेट 2007 में 3.4 और 2016 में 2.7 रही। तमाम दबाव के बाद 2018 में राजस्थान सरकार को इस नियम में बदलाव करना पड़ा और सरकारी बाबुओं को तीसरे बच्चे की अनुमति देनी पड़ी। ऐसे ही उत्तराखंड में भी 2002 में जनसंख्या नियंत्रण संबंधी नियम लागू किये गए लेकिन 2018 के लोकल बॉडी इलेक्शन में हाइकोर्ट ने इस नियम को रद्द कर दिया। इसी प्रकार बिहार में भी 2020 के पंचायत चुनाव के दौरान एक कानून रद्द किया गया।

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विश्व में बच्चा पैदा करने संबंधी क्या हैं नियम

वैश्विक स्तर पर देखें तो इस मामले में चीन सबसे चर्चित देश रहा है। चीन 1979 में वन चाइल्ड पॉलिसी लेकर आई। परिणामस्वरूप 2005 आते- आते चीन की टोटल फर्टिलिटी रेट नेगेटिव में चली गयी। 2005- 2008 तक चीन का लिंगानुपात विश्व मे सबसे खराब रहा (120:100)। जिस कारण चीन में लड़कों की शादी के लिए लड़की के घर वालों को पैसे देने की प्रथा शुरू हो गयी। आलम ये था कि चीन को को अपनी पालिसी को वन चाइल्ड से टू चाइल्ड और बाद में टू चाइल्ड से थ्री चाइल्ड में परिवर्तित करना पड़ा।
इसके अलावा विकसित देशों में फर्टिलिटी रेट इतना कम को गया है कि कई देश बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहन राशि दे रहे हैं जैसे- सिंगापुर और जर्मनी।

भारत में जनसंख्या वृद्धि की स्थिति

भारत देश की जनसंख्या 1960 के दशक में तकरीबन 46 करोड़ थी और उस समय देश की फर्टिलिटी रेट 5.91 थी। 1980 में ये बढ़कर तकरीबन 72 करोड़ हो गयी लेकिन फर्टिलिटी दर गिरकर 4.96 पर आ गयी। अगर 2020 की बात करें तो भारत की जनसंख्या लगभग 137 करोड़ हो गयी है और फर्टिलिटी रेट 2.22 रह गयी है जो कि डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा निर्धारित रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी रेट 2.1 से थोड़ी ज्यादा है। आकड़ों से साफ पता चलता है कि देश मे लगातार जनसंख्या वृद्धि के प्रति लोग जागरूक हो रहे हैं और निरन्तर कम बच्चे पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या फर्टिलिटी रेट का धर्म से कोई संबंध है

कुछ लोग एक धार्मिक समुदाय विशेष को जनसंख्या विस्फोट का कारण मानते हैं। आइए आकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं इस बात में कितनी सच्चाई है। अगर हम भारत में रहने वाले दो सबसे बड़े समुदाय हिन्दू और मुस्लिम की तुलना करते हैं तो देखेंगे कि क्रमशः 1992, 1999, 2006 और 2016 में जहां हिंदुओं की फर्टीलिटी रेट 3.3, 2.8, 2.6 और 2.1 थी वहीं मुस्लिमों की फर्टीलिटी रेट 4.4, 3.6, 3.4 और 2.6 रही है। आकड़ों के अनुसार बहुत स्पष्ट हो जाता है कि दोनों समुदायों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काम किया है।

आंकड़े इस बात की गवाही हैं कि जनसंख्या विस्फोट का संबंध धर्म से जोड़कर कर देखना केवल पूर्वाग्रह है इससे ज्यादा कुछ नहीं। जैसे- जैसे परिवार नियोजन और जनसँख्या नियंत्रण से संबंधी जागरूकता बढ़ी है, उसी क्रम में फर्टीलिटी रेट में भी गिरावट आई है।

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क्या UP या देश के लिए टू चाइल्ड पॉलिसी ही है समाधान

2020 में जारी किये गए आकड़ो के अनुसार उत्तर प्रदेश की फर्टिलिटी रेट लगभग 2.7 के आसपास है। जो कि देश की टोटल फर्टिलिटी रेट 2.23 से थोड़ा ही ज्यादा है। 2011 के जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 20.42 करोड़ थी और वर्तमान में 23 करोड़ होने का अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में सवाल है कि जब उत्तर प्रदेश रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी रेट 2.1 के इतना करीब है तब क्या टू चाइल्ड पालिसी ही जनसंख्या नियंत्रण का समाधान हो सकता है। विगत दो दशक के आंकड़ों को देखे तो समझ आता है कि टोटल फर्टिलिटी रेट (टी.एफ.आर) का सीधा संबंध महिला साक्षरता दर से जुड़ा हुआ है।

वर्ष 2015- 16 में उत्तर प्रदेश में अशिक्षित महिलाओं का टी.एफ.आर. 3.5 था जबकि 12वीं कक्षा से अधिक पढ़ी महिलाओं में यह रेट 1.9 था। इसी प्रकार वर्ष 1998- 99 में शिक्षित और अशिक्षित महिलाओं में टी.एफ.आर. क्रमशः 2.49 और 4.54 था। केरल और बिहार की महिला साक्षरता दर क्रमशः 92% और 54.9% है और टी.एफ.आर. क्रमशः 1.8 और 3.5 है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के दो दशकों और राज्यवार आकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद हम कह सकते हैं कि महिला साक्षरता दर और जनसंख्या नियंत्रण का सीधा संबंध है।

हमने ऊपर देखा कि किस प्रकार चीन में जनसंख्या नियंत्रण कानून ने वहां के लिंगानुपात पर विपरीत प्रभाव डाला। जिस प्रकार चीन में पितृसत्ता है उसी प्रकार भारत खास उत्तर प्रदेश और बिहार में पितृसत्ता देखा जा सकता है। ऐसे में बहुत अधिक संभावना है कि टू चाइल्ड पालिसी जैसे कानून महिलाओं के शोषण का साधन बन जाएं। महिलाओं पर लड़का पैदा करने का दबाव रहेगा ऐसे में भ्रूण हत्या के केस बढ़ेंगे। साथ ही लिंगानुपात बिगड़ सकती है।

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ऐसे में सरकार को चाहिए कि उपरोक्त पालिसी के जरूरतों और दुष्प्रभावों पर सरकार गहन विचार विमर्श करने के बाद कोई फैसला ले। साथ ही इस पालिसी के अलावा जनसंख्या नियंत्रण के अन्य तरीकों पर भी विचार करें। मेरी समझ है कि यदि सरकार बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य महिलाओं को उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करें और साथ ही लैंगिक समानता और महिला सुरक्षा का भरोसा दिलाने में कामयाब रहती है तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए टू चाइल्ड पालिसी जैसे कानूनों की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

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